paswaan

नयी दिल्ली. “राजनीति में आप जिसका साथ दे रहे हैं, वह आपको भुला सकता है, लेकिन अगर आप किसी समूह पर हमला बोल दें तो वे ना कभी भूलेंगे और नाहीं कभी माफ करेंगे” ऐसी बात पर यकीन रखने वाले बिहार राजनीती के सिरमौर माने जाने वाले दलित नेता रामविलास पासवान (RamVilas Paswan) का गुरुवार को देर शाम निधन हो गया है।

बता दें की पासवान एक ऐसे एकलौते नेता हैं, जो 9 बार सांसद और 7 बार केंद्र में मंत्री रहे। यही नहीं उनको उनको देश के6 प्रधानमंत्रियों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर काम करने का मौका भी मिला। वे खुद तो खुद कभी किंग (प्रधानमंत्री) नहीं बन सके लेकिन अपने पांच दशक से भी लंबे करियर में उन्होंने तमाम लोगों को शीर्ष की कुर्सी पर बैठाया और उन्हें उतरते हुए भी देखा। इस तरह एक किंगमेकर की भूमिका जरुर निभाई।

केंद्र में जब भी रामविलास पासवान को मंत्री पद मिला,तब तब उनके कार्य से सरकार को मान तो मिला ही मिला साथ ही सत्ताधारी पार्टी के जनाधार में भी भारी तादाद बढ़ी। रामविलास पासवान 1977 में पहली बार सांसद बने थे। इसके पश्चात उन्होंने कभी पलटकर नहीं देखा। अपने राजनितिक सफ़र में वे  1980, 1989, 1996, 1998, 1999, 2004 और 2014 में जीत दर्ज हासिल करने में कामयाब रहे। उन्होंने 1991 के लोकसभा चुनाव में भी जनता दल के टिकट पर रोसड़ा लोकसभा क्षेत्र से जीत दर्ज की थी। लेकिन इन्ही पासवान को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में हाजीपुर सीट से 1984 और फिर 2009 में हार का मुंह भी देखना पड़ा था। 

पासवान 7 बार रहे केन्द्रीय मंत्री 

बता दें कि रामविलास पासवान सात बार केंद्र सरकार में मंत्री पद पे भी रहे हैं, इनमें जहाँ 2 बार अटल बिहारी वाजपेयी और साथ ही 2 बार मौजूदा PM नरेंद्र मोदी की सरकार में मंत्री रहे। देखा जाए तो 1989 से लेकर अब तक सिर्फ चंद्रशेखर और वीपी नरसिम्हा राव की सरकार को छोड़कर केंद्र में जिस दल की भी जब सरकार बनी, उसमें रामविलास पासवान मंत्री पद पर जरुर रहे हैं। इस प्रकार वे विश्वनाथ प्रताप सिंह, एचडी देवेगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी सरकार में पासवान मंत्री रहे हैं।

मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करवाने में अहम् हाथ 

यह बात भी प्रासंगिक है कि पासवान को जब भी केंद्र में मंत्री पद पर रहे , उन्होंने कोई ना कोई ऐसा काम जरूर किया जो देशव्यापी चर्चा में कभी न कभी जरूर रहा है। पहली बार 6 दिसम्बर 1989 को वह प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के मंत्रिपरिषद में श्रम व कल्याण मंत्री बनेथे, तब उन्होंने मंडल आयोग की सिफारिशों को देश में लागू करने का बड़ा काम किया था। इसके चलते OBC समुदाय के 27 % आरक्षण का लाभ मिला था, तब इस कदम से देश की राजनीति का सुर-ताल  बदल गया था। 

रेल मंत्री के तौर पर भी किया कई बड़े अहम फैसले

साल 1995 में जब एचडी देवेगौड़ा प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार में रामविलास पासवान को रेल मंत्रालय का अहम् जिम्मा सौंपा था। तब एक रेल मंत्रि के तौर पर उन्होंने कुलियों को लेकर बड़ा अहम् फैसला लिया था और इसके साथ ही यात्री सुविधाओं में भी वृद्धि करने का साहसिक काम किया था । जहाँ रेल मंत्री के रूप में उन्होंने जून 96 से 13 मार्च 98 तक काम किया था वहीं इसके बाद गुजराल सरकार में भी वो रेल मंत्री के पद पर ही रहे थे।

गांव-गांव तक मोबाइल नेटवर्क पहुंचाना में उनका अहम् योगदान 

साल 1996 में रामविलास पासवान ने NDA के साथ हाथ मिला लिया। वे अटल बिहार बाजपेयी सरकार में संचार मंत्री पद पर आसीन हुए। आज गांव तक मोबाइल नेटवर्क पहुंचाने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। संचार मंत्रालय के बाद अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में ही वे फिर खनन मंत्री बने और उस वक्त उन्होंने कोयले की रॉयल्टी को लेकर बड़ा साहसिक फैसला लिया था। लेकिन इसके बाद साल  2002 में पासवान NDA से अपने रास्ते अलग कर लिए थे।

कोरोना काल में बिना राशन कार्ड के भी घर-घर राशन पहुंचाने में उनका योगदान 

इसके बाद साल 2004 में जब UPA की सरकार अस्तित्व में आई तो तत्कालीन PM मनमोहन सिंह ने पासवान को रसायन व उर्वरक मंत्री का पद दिया था। मनमोहन सिंह के कार्यकाल में वह मई 2004 से मई 2009 तक इस मंत्री पद पर  रहे। इसके बाद वो हालाँकि चुनाव हार गए थे और फिर UPA का साथ छोड़कर 2014 के चुनाव के ठीक पहले NDA में जा मिले थे। PM नरेन्द्र मोदी की पहली सरकार में वे खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री रहे और दोबारा 2019 में भी फिर इसी विभाग की जिम्मेदारी बखूबी संभाल रहे थे। उन्होंने कोरोना काल में देशभर में घर-घर राशन पहुंचाने का काम बड़े ही अच्छे तरीके से निभाया ताकि कोई भूखा न सो सके। यही नहीं बिना राशन कार्ड वालों को भी अनाज देने का काम उन्होंने किया था।

सोनिया गाँधी भी थी उनकी कायल 

राजनीति की बारीक नब्ज पर उनकी पकड़ इस कदर थी कि वे  कि वोट के एक निश्चित भाग को इधर से उधर शिफ्ट करा सकते थे मतलब वे जनता कि नब्ज कि समझ रखते थे । इनके राजनीतिक कौशल का ही प्रभाव था कि उन्हें UPA में शामिल करने के लिए सोनिया गांधी खुद चलकर उनके आवास पर उन्हें रजामंद करने गयी थी गई थीं। 

लालू के थे वे ‘मौसम विज्ञानी’ 

यह बात भी दिलचस्प है कि 1996 से 2015 तक केन्द्र में सरकार बनाने वाले समस्त राष्ट्रीय गठबंधन चाहे वह UPA हो या NDA, वे जरुर उसका  हिस्सा रहे थे। इसी कारण लालू प्रसाद ने उनको ‘मौसम विज्ञानी’की संज्ञा दी थी। रामविलास पासवान खुद भी इस बात को मानते थे कि वह जहां रहते थे सरकार उन्ही कि या उसी पक्ष की बनती थी ।