जानें बाबरी मस्जिद का इतिहास, कैसे और किसने रखी नींव

आज पूरे देशभर की जनता की निगाहे उच्चतम न्यायालय पर टिकी हुई है। सब यह जानने को बैचेन है कि राम मंदिर और मज्जिद मामले पर कोर्ट का क्या फैसला होगा। यह मामला आज का नहीं, 500 वर्ष पुराना हैं। जिसका फैसला

आज पूरे देशभर की जनता की निगाहे उच्चतम न्यायालय पर टिकी हुई है। सब यह जानने को बैचेन है कि राम मंदिर और मज्जिद मामले पर कोर्ट का क्या फैसला होगा। यह मामला आज का नहीं, 500 वर्ष पुराना हैं। जिसका फैसला आज होने जा रहा हैं। अयोध्या को राम की जन्मभूमि माना जाता है। कारण वश हिंदुओं का दावा है कि यहां पर पहले मंदिर था जिसे तोड़कर मस्जिद बनवाया गया। वहीं मुस्लिम समुदाय का दावा एकदम इसके उलट है। चलिए जानते हैं कब और किसने बनाई थी बाबरी मस्जिद। 

माना जाता है मुगल शासक बाबर के सेनापति मीर बाकी ने अयोध्या में मस्जिद का निर्माण किया था जिसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था। इस मस्जिद का निर्माण मीर बाकी ने अपने बादशाह बाबर के नाम पर किया था। बाबर 1526 में भारत आया था। 1528 तक उसका साम्राज्य अवध (वर्तमान अयोध्या) तक पहुंच गया। आपको बता दें, इसके बाद करीब तीन सदियों तक के इतिहास की जानकरी किसी भी ओपन सोर्स पर मौजूद नहीं है। 

जिसके बाद 6 दिसंबर 1992 की तारीख इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई। हजारों की संख्या में कारसेवकों ने अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद ढहा दिया था और एक अस्थाई राम मंदिर बना दिया था। इसके बाद ही पूरे देश में चारों ओर सांप्रदायिक दंगे होने लगे। इसमें करीब 2000 लोगों ने अपनी जान गंवाई। 

अयोध्या मंदिर- मस्जिद मुद्दे को लेकर हिंदू-मुस्लिम के बीच पहली बार 1853 में दंगा हुआ था। उस समय निर्मोही अखाड़ा ने ढांचे पर दावा करते हुए कहा कि जिस स्थल पर मस्जिद खड़ा है। वहां एक मंदिर हुआ करता था। जिसे बाबर के शासनकाल में नष्ट किया गया। अगले 2 सालों तक इस मुद्दे को लेकर अवध (वर्तमान में आयोध्या) में हिंसा भड़कती रही। फैजाबाद जिला गजट 1905 के अनुसार 1855 तक, हिंदू और मुसलमान दोनों एक ही इमारत में पूजा या इबादत करते रहे थे। 

तब से लेकर आज तक हिंदू मुस्लिम समुदाय के बीच इस बात पर बहस छिड़ी है कि अयोध्या में पहले मंदिर था या मस्जिद। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को ढहा दिया गया। जिसके बाद जमीन के मालिकाना हक से जुड़ा एक मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में दर्ज किया गया था। 

इस मामले में हाई कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने 30 सितंबर 2010 को 2.77 एकड़ की जमीन पर अपना फैसला सुनाया था। इस फैसले के अनुसार जमीन का एक तिहाई हिस्सा राम मंदिर को जाएगा। जिसका प्रतिनिध्त्व ‘हिंदु महासभा’ करेगा। दूसरा एक तिहाई हिस्सा ‘सुन्नी वक्फ बोर्ड’ को और बाकी का एक तिहाई निर्मोही अखाड़े को दिए जाने का फैसला किया गया। 9 मई 2011 में हिंदू और मुस्लिम पक्षों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी थी। जसके बाद आज इसके फैसले का दिन हैं।