MODI-AKALI-DAL

नयी दिल्ली.  एक तरफ देश कोरोना से अपने निर्णायक युद्ध से जूझ रहा है वहीं दूसरी तरफ इसके राजनीतिक धरातल में भी खलबली मची हुई है। बात दरअसल कृषि विधेयकों की है जिनके चलते NDA अब बिखर गयी है। जी हाँ शिरोमणि अकाली दल NDA से अलग हो गया है। जिसके चलते BJP का 22 साल पुराना सहयोगी ‘अकाली दल’ अब उससे छुट गया है। इसकी शुरुआत 9 दिन पहले 17 सितम्बर को हुई जब हरसिमरत कौर ने लोकसभा और राज्यसभा में इन बिलों का विरोध करते हुए मोदी सरकार में मंत्री पद से अपना इस्तीफा दे दिया था।

पता हो कि शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल ने कृषि विधेयकों के विरोध में  बीते  शनिवार रात को भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) से अलग होने की घोषणा की थी । बता दें कि कृषि विधेयकों का सबसे ज्यादा विरोध  पंजाब और हरियाणा में हुआ  है। यहां किसान पिछले 20 दिनों से अपना उग्र प्रदर्शन कर रहे हैं। पंजाब के सभी जिलों में किसान अब सड़क और रेल रोको आंदोलन पर उतर गए हैं। यही नहीं  कांग्रेस, अकाली दल, आप, लोक इंसाफ पार्टी और बसपा का समर्थन भी अब इन किसानों को  मिल रहा है। 

ऐसा क्या परेशानी थी अकाली दल को 

गौरतलब है कि अकाली दल वैसे ही आपसी फूट से जूझ रही थी। ऐसे में  मोदी सरकार के कृषि विधेयक उनके गले का काँटा बन गए थे, क्योंकि पार्टी को यह साफ़ पता चल रहा था कि अगर वह इनके लिए मोदी सरकार  को हामी भरती तो पंजाब के एक बड़े वोट बैंक यानी वहाँ के किसानों से उसे हाथ धोना पड़ता जो उसके लिए भयंकर साबित होता।

पता हो कि पंजाब के कृषि प्रधान क्षेत्र मालवा में अकाली दल की अपनी मजबूत पकड़ है। वहीं बात  2022 के विधानसभा चुनाव कि भी है जिसके लिए अकाली दल तैयार हो रहा है । जहाँ 2017 से पहले अकाली दल ने  राज्य में लगातार दो बार अपनी सरकार रबनायीं थी । वहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में 117 सीटों में से अकाली दल सिर्फ 15 सीटों में सिमट गया था । ऐसे में अबके 2022 के चुनाव से पहले अकाली दल किसानों के एक बड़े वोट बैंक को अपने खिलाफ नहीं करना चाहता और न ही पंजाब कि सत्ता को हमेशा के लिए खोना चाहता है ।

कौन से हैं वे तीन ‘कृषि विधेयक’ जिनका हो रहा विरोध

  1. फार्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रमोशन एंड फेसिलिटेशन) बिल.
  2. फार्मर्स (एम्पावरमेंट एंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट ऑफ प्राइस एश्योरेंस एंड फार्म सर्विसेज बिल.
  3. एसेंशियल कमोडिटीज (अमेंडमेंट) बिल.

1998 से अकाली दल NDA का था  ख़ास सहयोगी 

आपको बता दें कि, 1998 में जब लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी ने NDA के गठन का सोचा था, तो उस वक्त जॉर्ज फर्नांडीज की समता पार्टी, जयललिता की अन्नाद्रमुक, प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व वाला अकाली दल और बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना ने ही इसे सबसे पहले ज्वॉइन किया था। हालाँकि समता पार्टी  बाद में नाम बदलकर JDU हो गयी थी । जहाँ JDU,द्रमुक NDA को एक बार छोड़कर फिर घर -वापसी कर चुकी है। वहीं शिवसेना अब कांग्रेस के साथ महाराष्ट्र में अपनी सरकार चला रही  है। इनमे अकाली दल ही अकेली  ऐसी पार्टी थी, जिसने अब तक NDA का साथ कभी नहीं छोड़ा था।

क्या अकाली दल के अलग होने से  NDA को पड़ेगा कोई फर्क ?

अगर हम राजनीतिक समीकरण देखें तो हम पायेंगे कि अकाली दल के लोकसभा में अभी दो सांसद हैं। वहीं, राज्यसभा में उनके तीन सांसद हैं। वहीं राजनीती के पंडितों का कहना है कि इससे दोनों सदनों में NDA की ताकत में कोई फर्क नहीं पड़ना । दरअसल, अगर हम देखें तो यह बेहद सोची समझी रणनीति के तहत  उठाया गया कदम है। एक तो यह सभी को पता है कि पंजाब में BJP का कोई विशेष  वोट बैंक नहीं है। इससे नुकसान की संभावना तो बेहद कम है। उधर, जहाँ इन कृषि विधेयकों से  अकाली दल को अपना बड़ा नुकसान होता दिख रहा था। वहीं पिछले चुनाव में पार्टी को ‘AAP’ की वजह से बहुत नुकसान उठाना पड़ा था। जहाँ सिर्फ ‘AAP’ की चुनावी सेंध  के चलते अकाली दल पार्टी सीटों के मामले में तीन पर सिमट गई थी।

फिलहाल  ‘मक्की दी रोटी-सरसों दा साग’ से ‘लिट्टी-चोखा’ ज्यादा अहम्

चाहे जो हो लेकिन इतना तो तय है कि अकाली दल ने अपना राजनीतिक विश्लेषण करके ही NDA से अलग हुई है इसमें कोई दो राय नहीं। वहीं BJP को भी  अकाली दल के आने-जाने से कोई विशेष फर्क नहीं पड़ते दिख रहा है। फिलहाल BJP का अहम्  चुनावी एजेंडा तो बिहार है जिसको वह मुख्यमंत्री  नितीश कुमार ‘सुशासन बाबु’ के साथ साध रही है। पंजाब के लिए भी वह जल्द ही अपने पत्ते बिछाएगी। फिलहाल तो सारे दल अपनी-अपनी चाल राजनीति की बिसात पर चल चुके हैं देखना है की उंट अब किस करवट बैठेगा।