UPSC टॉपर: अनपढ़ मजदुर का IAS बेटा, जो उधारी के पैसों से पहुंचा दिल्ली

जहां चाह वहीं राह। जब मन में कुछ कर गुजरने का दृढ़ निश्चय हो तब बड़ी-से-बड़ी चुनौती भी आपको रोक नहीं सकती। आंध्र प्रदेश के एक छोटे-से गांव में रहने वाले गोपाल कृष्ण रोनांकी(IAS Gopala Krishna Ronanki) ने इस वाक्य को साबित कर दिया है। गोपाल ने अपने परिश्रम से कामयाबी को कदम चूमने के लिए मजबूर कर दिया। आईए जानते हैं उस युवा के बारे में जिसने संघर्षों का सामना करते हुए देश के सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा यूपीएससी (UPSC) में तीसरा रैंक हासिल किया। यूपीएससी टॉपर्स को सम्मानित करने के लिए जब दिल्ली (Delhi) बुलाया गया उस वक्त गोपाल कृष्ण रोनांकी के पास दिल्ली जाने के लिए किराए तक के भी पैसे नहीं थे। वह पड़ोसी से पैसे उधार लेकर दिल्ली गए। चलिए जानते हैं इनके संघर्षों की प्रेरणादायक कहानी है।

 

किसान का वह बेटा जिसे ना हिंदी भाषा का ज्ञान था ना इंग्लिश। छोटे गांव का होने की वजह से किसी भी कोचिंग संस्थान में एडमिशन नहीं मिल पा रहा था। फिर भी गोपाल ने हिम्मत नहीं हारी और प्रयास जारी रखा। गोपाल बेहद गरीब परिवार से ताल्लुख रखते हैं। उनके माता पिता खेतों में मजदूरी करते हैं। दोनों अशिक्षित हैं पर उनका सपना था कि, उसका बेटा कलेक्टर बने। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के चलते गोपाल की प्राथमिक शिक्षा सरकारी स्कूल में ही हुई। घर में बिजली नहीं होने की वजह से उन्हें अंधेरे में ही पढ़ना पड़ता था। गोपाल जब बड़े हुए तब भी उनके घर की आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी नहीं थी कि उन्हें कॉलेज की पढ़ाई के लिए भेजा जा सके। इसलिए गोपाल ने ग्रेजुएशन की शिक्षा डिस्टेंस एजुकेशन से पूरी की उन्होंने अपनी शिक्षा तेलुगु भाषा में पूरी की है।

गोपाल ने ग्रेजुएशन पूरा होने के बाद टीचर्स ट्रेनिंग का कोर्स किया। वर्ष 2006 में उन्हें एक सरकारी स्कूल में शिक्षक की नौकरी लगी। जिससे हर महीने कुछ पैसे उन्हें मिल जाते थे। उनके लिए यह नौकरी बहुत महत्वपूर्ण थी। परंतु गोपाल ने अपने सपने को मरने नहीं दिया और मेहनत जारी रखी। अंतः गोपाल ने नौकरी छोड़ने का फैसला लिया। अपने सपने को पूरा करने की दिशा में यह एक ठोस कदम था। गोपाल शिक्षक की नौकरी छोड़कर हैदराबाद (Hyderabad) चले गए। वे किसी अच्छे संस्थान में एड्मिशन लेना चाहते थे।

 

 पैसों को कमी और हिंदी, इंग्लिश भाषा का ज्ञान नहीं होने के कारण किसी कोचिंग संस्थान में दाखिला नहीं ले पाए। अंत में उन्होंने खुद तैयारी करने का फैसला लिया। गोपाल ने अपने बल पर तैयारी करना आरंभ किया। परंतु सही गाइडेंस नहीं मिलने की वजह से उन्हें UPSC के परीक्षा में तीन बार असफलताओं का सामना करना पड़ा। लेकिन गोपाल ने अपनी असफलताओं से हार नहीं मानी। वह अपनी असफलताओं से सीख लेकर आगे बढ़ते रहे। उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत और लगन से UPSC की परीक्षा में तीसरा स्थान हासिल किया। उस समय उनके माता-पिता को इस बात की जानकारी नहीं थी। वे सोचते थे कि वह एक शिक्षक की नौकरी कर रहा है तथा शांति से जीवन व्यतीत कर रहा है।

गोपाल कृष्ण रोनांकी कहते हैं कि माध्यमिक शिक्षा ग्रहण करने तक उनके घर में बिजली नहीं थी। उनके माता-पिता जानते थे कि वह एक शिक्षक हैं। परंतु उन्होंने अपने माता-पिता का यह भ्रम तोड़ दिया तथा उन्हें बताया कि उनका आईएएस (IAS) के लिये चयन हो गया है। वह शीघ्र ही कलेक्टर बनेंगे।

गोपाल ने यूपीएससी (UPSC) की परीक्षा मेंस के लिए तेलुगु भाषा को ऑप्शनल सब्जेक्ट के रूप में चयन किया। उन्होंने इंटरव्यू भी तेलुगु भाषा में ही दिया। गोपाल ने तेलुगु द्विभाषीय की सहायता से इंटरव्यू दिया। गोपाल की गरीबी इतनी अधिक थी कि जब सम्मानित करने के लिए उन्हें दिल्ली बुलाया गया तो किराए के लिए भी पैसे नहीं थे। गोपाल कृष्ण ने 50 हजार रुपए पड़ोसी से उधार लेकर प्लेन का टिकट लिया और फिर वो सम्मान समारोह में शामिल होने के लिए दिल्ली गए। गोपाल  ने युवाओं  के लिए अनोखी मिसाल कायम की है।

बिना संघर्ष किए कामयाबी को हासिल नहीं किया जा सकता है, क्योंकि संघर्ष ही कामयाबी के शिखर तक पहुंचने की सीढ़ी है। आज की यह कहानी संघर्षों से जूझकर बिना हारे सफलता हासिल करने वाले एक शख्स की है।