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    नयी दिल्ली. जहाँ एक तरफ इसरो (ISRO) के पूर्व वैज्ञानिक नंबी नारायणन (Nambi Narayan) के जीवन पर अब एक फिल्म भी आ रही है। वहीं अब नारायणन से जुड़े 1994 जासूसी मामले में गलती करने वाले पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर उच्च-स्तरीय समिति द्वारा दाखिल रिपोर्ट पर विचार करने संबंधी केन्द्र की याचिका पर आज यानी गुरूवार को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में सुनवाई हुई। 

    जी हाँ आज न्यायमूर्ति ए. एम. खानविल्कर की अध्यक्षता वाली पीठ ने केन्द्र की अर्जी और शीर्ष अदालत के न्यायाधीश (अवकाश प्राप्त) डी. के.जैन की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय पैनल की रिपोर्ट पर सघनता से  विचार किया और CBI जांच के आदेश दिए। बता दें किकेन्द्र सरकार  ने बीते पांच अप्रैल को न्यायालय में अर्जी देकर मामले को राष्ट्रीय मुद्दा बताते हुए पैनल की रिपोर्ट पर तत्काल सुनवाई करने का भी अनुरोध किया था।

    इसीके चलते आज सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) डी।के। जैन की रिपोर्ट को रिकॉर्ड में लिया। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने CBI के निदेशक अथवा कार्यवाहक निदेशक को आदेश दिया कि जैन समिति की रिपोर्ट को प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के रूप में माने और इस जांच को आगे बढ़ाए। आपको बता दें कि 1994 जासूसी मामले से वैज्ञानिक नांबी नारायणन ना सिर्फ बाइज्जत बरी हो चुके हैं बल्कि शीर्ष अदालत ने केरल सरकार को भी मुआवजे के रूप में उन्हें 50 लाख रुपये देने को  कहा है। 

    NASA के  गोपनीय दस्तावेजों का था मामला:

    घटना 1994 कि है जब  अखबारों की सुर्खियों में रहे जासूसी के इस मामले आरोप था कि भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़े कुछ गोपनीय दस्तावेजों को दो वैज्ञानिकों और मालदीव की दो महिलाओं सहित चार अन्य ने अन्य देशों को भेजा है। इस मामले में वैज्ञानिक नांबी नारायणन को गिरफ्तार किया गया था। उस वक्त केरल में कांग्रेस की ही सरकार थी। 

    घटना कि विस्तारपूर्वक विवेचना:

    • वर्ष 1994 नवंबर में वैज्ञानिक नांबी नारायणन की गिरफ्तारी के बाद दिसंबर को जांच CBI को सौंपी गई। 
    • पुलिस और बाद में खुद CBI भी  जांच में सबूत नहीं खोज पाई। 
    • इसके बाद 50 दिनों की कठोर कैद के बाद वैज्ञानिक नांबी नारायणन को जनवरी 1995 में जमानत मिली।
    • वहीं अप्रैल 1996 में CBIने  इसे एक फर्जी केस माना और इसे तत्काल बंद करने का अनुरोध किया। 
    • मई 1996 में मजिस्ट्रेट अदालत ने इस मामले को खारिज कर सभी को बरी किया। 
    • इसके बाद वर्ष 1996 में माकपा सरकार ने मामले पर दोबारा जांच शुरू करने की अपने तरफ से पहल की। 
    • इसके बाद 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने बी इस मामले को मामला रद्द कर सभी को आरोप मुक्त किया।