क्या है MSP? कैसे होती है निर्धारित? जानें

पिछले कुछ दिनों से MSP या न्यूनतम समर्थन मूल्य यह शब्द लगातार चर्चा में है। यह शब्द किसानों से संबंधित है। क्या है MSP का मतलब? यह कैसे निर्धारित किया जाता है? क्या वाकई इससे किसानों को कोई लाभ मिलता है? तो आइए जानते हैं इस बारे में विस्तार से… (What is MSP? How is it determined?  )

क्या है न्यूनतम समर्थन मूल्य ?

MSP यानि Minimum Support Price इसे हिंदी में न्यूनतम समर्थन मूल्य कहा जाता है। सीधे शब्दों में कहें तो, ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ एक ऐसी प्रणाली है जिसके माध्यम से सरकार किसानों को एक निश्चित मूल्य पर उनकी उपज खरीदने की गारंटी देती है। वर्तमान में इस प्रणाली के तहत सरकार (Government) 23 कृषि उपजों (Agricultural produce) की खरीदी कर रही है। इनमें गेहूं, ज्वार, बाजरा, मक्का, मूंग, मूंगफली, सोयाबीन, तिल और कपास शामिल हैं।

इसका मतलब यह है कि, सरकार द्वारा कृषि उपज की खरीद दर की घोषणा की जाती है और सरकारी खरीद केंद्रों (Government procurement centers) पर कृषि उपज को खरीदा जाता है। इसका उद्देश्य यह है कि, यदि बाजार में कृषि वस्तुओं की कीमतें गिरती हैं, तो भी केंद्र सरकार (Center Government) द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों से कृषि वस्तुओं की खरीद की जाएगी। इससे किसानों को नुकसान से बचाया जा सकता है। 

कौन करता है निर्धारित ?

कमीशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइसेस (Commission for agriculture cost and prices) के आंकड़ों के आधार पर भारत सरकार (Government of India) का ‘कृषि मंत्रालय’ (Ministry of Agriculture) न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करता है।

एक कृषि उपज की गारंटी कृत कीमत पूरे देश में समान होती है। इसका मतलब यह है कि, महाराष्ट्र (Maharashtra) में जीस दर से एक क्विंटल गेहूं खरीदा जाता है, उसी दर में उसे पंजाब में भी खरीदा जाता है। 

2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) के सत्ता में आने के बाद भाजपा नेता शांताकुमार (BJP leader Shantakumar) के नेतृत्व में एक समिति गठित की गई थी। शांताकुमार समिति द्वारा 2016 में दी गई एक रिपोर्ट में कहा है कि, “न्यूनतम समर्थन मूल्य का देश के केवल 6 प्रतिशत किसानों को लाभ मिलता है। वहीं 86 प्रतिशत छोटे किसान अपनी उपज बेचने के लिए बाजार समितियों (Market committees) में जाते ही नहीं हैं।”  

कैसे होता है निर्धारित ?

2018 के केंद्रीय बजट (Central budget) में एक महत्वपूर्ण घोषणा की गई थी जिसमें कहा गया था कि, “किसानों को उत्पादन लागत (Production cost) से डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जायेगा।” यानि सरकार किसानों को उत्पादन की कुल लागत के पचास प्रतिशत लाभ की गारंटी देगी। मतलब, अगर उत्पादन लागत 1000 रुपये है, तो सरकार 1500 रुपये की गारंटी देगी।

उत्पादन की लागत का निर्धारण करते समय सरकार द्वारा विभिन्न घटकों पर विचार किया जाता है और इसके अनुसार उत्पादन लगत के विभिन्न प्रकार भी निर्धारित किये जाते हैं।

केंद्रीय कृषि मूल्य आयोग (Central Agricultural Price Commission) ने उत्पादन की लागत निर्धारित करने के लिए तीन सूत्र तय किए हैं।

ए -2 यह उत्पादन की लागत निर्धारित करने का पहला सूत्र है। ए – 2 के अनुसार बीज, उर्वरक, रसायन, श्रम, सिंचाई, ईंधन की वास्तविक लागत की गणना की जाती है।

उत्पादन की लागत तय करने के लिए दूसरा सूत्र है ए-2 + एफ एल (फॅमिली लेबर). इस सूत्र में किसान और उसके घर के सदस्यों के श्रम के मूल्य की भी गणना की जाती है। इसका मतलब यह है कि, यदि घर के सदस्य खेत में काम कर रहे हैं, तो उनकी श्रम लागत को भी ध्यान में रखा जाता है। वर्तमान में केंद्र सरकार ने जो गारंटी दी है वह ‘ए-2 + एफ-एल’ सूत्र के तहत दी है।

लेकिन, कृषितज्ञ एस स्वामीनाथन (S. Swaminathan) के अनुसार, न्यूनतम समर्थन मूल्य देने के लिए तीसरे यानि सी -2 इस सूत्र का उपयोग किया जाना चाहिए। 

यह तीसरा सूत्र है C-2 अर्थात Comprehensive ‘व्यापक’। इस सूत्र के अनुसार, उत्पादन की लागत बीज, उर्वरक, रसायन, श्रम, सिंचाई, ईंधन, पारिवारिक श्रम के साथ ही निवेश पर ब्याज (Interest on investment) और कृषि भूमि के किराए के आधार पर निर्धारित की जाती है। यदि न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करने में तीसरे सूत्र, सी -2 का उपयोग किया जाता है, तो कृषि उत्पाद को अधिक कीमत मिलती है।

अब किसानों का क्या कहना है?

आंदोलक किसानों (Farmer protest) का मानना है कि, केंद्र सरकार द्वारा पारित किये नए कृषि कानून (Agriculture Law) से किसानों का ज्यादा संबंध निजी व्यापारियों (Private traders) से होगा और इससे सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य का महत्व कम हो जायेगा। सरकार ने बार-बार कहा है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को बनाए रखा जाएगा, लेकिन किसानों को लगता है कि, गारंटी बनाए रखने के बावजूद, नए कानून के कारण प्रॅक्टिकली न्यूनतम समर्थन मूल्य का महत्व अपने आप कम होगा। 

किसान नेता ने कहा कि, “सरकार द्वारा शुरू किए गए कानूनों को हम निरस्त करना चाहते हैं। हम ऐसा कानून चाहते हैं जो एमएसपी से कृषि उपज की खरीद हो।”