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    नयी दिल्ली. आज हम बात करेंगे भारत के वीर सेनानी लाला लाजपत राय (Lala Lajpat Rai) जी के बारे में, जिन्हें भारत के महान स्वतंत्रता सेनानियों (Freedom Fighters) में गिना जाता है। आजीवन ब्रिटिश राजशक्ति का सामना करते हुए अपने प्राणों की परवाह न करने वाले लाला लाजपत राय को ‘पंजाब केसरी’ (Punjab Kesari) भी कहा जाता है। इतना ही नहीं उनकी याद में आज यानी 17 नवंबर को उनके ‘स्वर्ग-गमन’ के दिन को बलिदान दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।

    यूँ तो लालाजी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गरम दल के प्रमुख नेता तथा पूरे पंजाब के प्रतिनिधि भी हुआ करते थे। उन्हें ‘पंजाब के शेर’ की उपाधि भी मिली थी। उनका जन्म 28 जनवरी 1865 को पंजाब के फिरोजपुर जिले के धूदिकी गांव में हुआ था। उन्होंने क़ानून की शिक्षा प्राप्त कर हिसार में वकालत प्रारम्भ की थी, किन्तु बाद में स्वामी दयानंद के सम्पर्क में आने के कारण वे आर्य समाज के प्रबल समर्थक बन गये। यहीं से उनमें उग्र राष्ट्रीयता की परम भावना जागृत हुई।

    स्वामी दयानंद सरस्वती के निधन के बाद लालाजी ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर एंग्लो वैदिक कॉलेज के विकास के अनेक प्रयास करने शुरू कर दिए। यहीं से हिसार में लालाजी ने कांग्रेस की बैठकों में भी भाग लेना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे कांग्रेस के एक सक्रिय कार्यकर्ता बन गए। 1892 में वे लाहौर चले गए। 1897 और 1899 में जब देश के कई हिस्सों में अकाल पड़ा तो लालाजी राहत कार्यों में सबसे अग्रिम मोर्चे के हर मौके पर दिखाई दिए। जब अकाल पीड़ित लोग अपने घरों को छोड़कर लाहौर पहुंचे तो उनमें से बहुत से लोगों को लालाजी ने खुद अपने घर में ठहराया। इसके साथ ही उन्होंने बच्चों के कल्याण के लिए भी कई काम किए। जब कांगड़ा में भूकंप ने जबरदस्त तबाही मचाई तो उस समय भी लालाजी राहत और बचाव कार्यों में सबसे अग्रणी रहे।

    इसके बाद अंग्रेजों ने जब 1905 में बंगाल का विभाजन किया तो लाला जी ने सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और विपिनचन्द्र पाल जैसे आंदोलनकारियों से हाथ मिला लिया और अंग्रेजों के इस फैसले की जमकर मुखालफत की। उन्होंने देशभर में स्वदेशी वस्तुएं अपनाने के लिए अभियान चलाया। इसके बाद लालाजी आजादी के लिए लगातार संघर्ष करते रहे। इसके बाद लालाजी ने 1920 में कलकत्ता में कांग्रेस के एक विशेष सत्र में भाग लिया। वे गांधीजी द्वारा अंग्रेजों के खिलाफ शुरू किए गए असहयोग आंदोलन में भी कूद पड़े। इसके बाद लाला लाजपत राय के नेतृत्व में यह आंदोलन पंजाब में जंगल में आग की तरह फैल गया और जल्द ही वे ‘पंजाब का शेर’ या ‘पंजाब केसरी’ जैसे नामों से उन्हें पहचाना जाने लगा । 

    लेकिन लालाजी ने अपना सर्वोच्च बलिदान साइमन कमीशन के समय दिया। दरअसल 3 फरवरी 1928 को यह कमीशन भारत पहुंचा जिसके विरोध में पूरे देश में आग भड़क उठी। फिर लाहौर में 30 अक्टूबर 1928 को एक बड़ी घटना घटी, जब लाला लाजपत राय के नेतृत्व में साइमन का विरोध कर रहे यहाँ के युवाओं को बेरहमी से पीटा गया। इतना ही नहीं पुलिस ने लाला लाजपत राय की छाती पर निर्ममता से लाठियां बरसाईं। वे बुरी तरह घायल हो गए और अंतत: इसके चलते 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु  हो गई।

    इधर लालाजी की मौत से जैसे सम्पूर्ण देश उत्तेजित हो उठा और चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव व अन्य क्रांतिकारियों ने लालाजी की मौत का बदला लेने की भी ठान ली। इन जांबाज देशभक्तों और क्रांतिकारियों ने लालाजी की मौत के ठीक 1 महीने बाद अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर ली और 17 दिसंबर 1928 को ब्रिटिश पुलिस के अफसर सांडर्स को सरेआम गोली से उड़ा दिया। लालाजी की मौत के बदले सांडर्स की हत्या के मामले में ही राजगुरु, सुखदेव और भगतसिंह को बाद में फांसी की सजा भी सुनाई गई। अब लाला जी की याद में आज ही के दिन यानी 17 नवंबर को बलिदान दिवस के रूप में सम्पूर्ण देश में मनाया जाता है। 

    देखा जाए तो लाला लाजपत राय सिर्फ आजादी के मतवाले ही नहीं, बल्कि एक महान समाज सुधारक और महान समाजसेवी भी थे। इसीके चलते उनके लिए जितना सम्मान गांधीवादियों के दिल में था, ठीक उतना ही सम्मान उनके लिए भगतसिंह और चन्द्रशेखर आजाद जैसे बड़े क्रांतिकारियों और देशभक्तों के दिल में भी था। वैसे तो आजादी की लड़ाई का इतिहास क्रांतिकारियों के विविध साहसिक कारनामों से भरा पड़ा है और ऐसे ही एक वीर सेनानी थे लाला लाजपत राय जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था।