Supreme court

    नई दिल्ली:  उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) के पास जमा कराई गई ऋणदाताओं की समिति (COC) द्वारा मंजूर समाधान योजना को वापस नहीं लिया जा सकता और न ही उसमें संशोधन किया जा सकता है।

    शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि इसकी अनुमति दी जाती है, तो इससे एक और स्तर का मोल-तोल शुरू होगा, जो सांविधिक दृष्टि से पूरी तरह नियमन के दायरे से बाहर होगा। न्यायालय ने कहा कि सीओसी और सफल समाधान आवेदक के बीच समाधान योजना आईबीसी के प्रावधानों तथा सीआईआरपी नियमनों के तहत बाध्यकारी है और उसे वापस नहीं लिया जा सकता। 

    न्यायालय ने वित्त पर संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट का उल्लेख किया। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि एनसीएलटी के समक्ष 71 प्रतिशत मामले 180 दिन से अधिक से लंबित हैं। यह मूल उद्देश्य और कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) की समयसीमा के अनुरूप नहीं है। 

     न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ ने एनसीएलटी तथा एनसीएलएटी से इस तरह के विलंब पर संवेदनशील बनने को कहा है। शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) से पहले दिवाला व्यवस्था के विफल होने की प्रमुख वजह न्यायिक विलंब ही था। हम मौजूदा दिवाला व्यवस्था का भी ऐसा हाल नहीं चाहते हैं।” 

    उच्चतम न्यायालय ने 190 पृष्ठ का यह फैसला एबिक्स सिंगापुर प्राइवेट लि. की याचिका को खारिज करते हुए दिया है। एबिक्स ने एडुकॉम्प के ऋणदाताओं की समिति की याचिका पर राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) के फैसले को चुनौती दी थी। एनसीएलएटी ने एनसीएलटी द्वारा एबिक्स की समाधान योजना को वापस लेने की अनुमति के फैसले को खारिज कर दिया था। 

    शीर्ष अदालत ने इसके अलावा दो अन्य कंपनियों की इसी मुद्दे पर याचिका के जवाब में यह निर्णय सुनाया है। इन कंपनियों ने भी आईबीसी के तहत समाधान योजना को वापस लेने अथवा उसमें सुधार के अधिकार का मुद्दा उठाया था।  (एजेंसी)