UTTARKASHI
सिलक्यारा टनल रेस्क्यू मिशन

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नई दिल्ली/उत्तरकाशी: आखिरकार उत्तरकाशी टनल (Uttarkashi Tunnel Rescue) में 17 दिन तक चला अनेकों मुश्किल वाला रेस्क्यू मिशन (Tunnel Rescue Mission) पूरी तरह से कामयाब रहा। बीते मंगलवार को  सिलक्यारा टनल (Silkyara Tunnel) में फंसे सभी 41 मजदूर सुरंग से सुरक्षित बाहर निकाल लिए गए।

इस कामयाबी के पीछे रेस्क्यू टीम के लगातार इतने दिनों तक बिना थके, बिना रुके किये अथक परिश्रम के चलते यह मिशन परवान चढ़ा। बाधाएं यो कई आईं-मुश्किलों ने भी तो बहुत पेरशान किया। मगर जीवट रेस्क्यू टीम ने हौसला नहीं छोड़ा। इसमें धैर्य के साथ अन्दर फंसे मजदूरों ने भी पूरा साथ दिया और जिंदगी एक बार फिर मौत और मुश्किलों से अपनी जंग जीत गई।

इन सबके बीच उन अंदर फंसे मजदूरों के परिवारवालों का धैर्य और उत्तराखंड और केंद्र सरकार पर उनका विश्वास भी तो जरुरी था, जिन्होंने ऐसे जबरदस्त तनाव वाले मौके पर अपना धैर्य नही खोया और हमेशा इसी बात पर विश्वास रखा कि उनके लोग जरुर बाहर आएंगे। आइये जानते हैं ऐसे ही कुछ लोगों का अनुभव उनकी जुबानी।

उत्तरकाशी के सिल्क्यारा सुरंग से बचाए गए श्रमिकों में से एक श्रमिक सोनू की मां कहती हैं, “मैं बहुत खुश हूं। मैं सरकार और सभी बचाव दल के सदस्यों को धन्यवाद देती हूं।मेरे बेटे ने कहा है कि वह दो दिन में वापस लौट आएगा।” वहीँ टनल से बचाए गए श्रमिक राम सुंदर की मां धनपति ने कहा, “हम बहुत खुश हैं।।। कल शाम को हमने दिवाली मनाई, पूरे गांव ने कल खुशी से दिवाली मनाई।” 

इसके साथ ही बचाए गए श्रमिक राम सुंदर की पत्नी शीला ने भावविभोर होते हुए कहा, “हम बहुत खुश हैं, कल हमने उनसे फोन पर बात की थी। हम केंद्र सरकार और बचाव कर्मियों का धन्यवाद करते हैं। हमारे पूरे गांव में बहुत खुशी है।” बचाए गए श्रमिक संतोष कुमार की मां ने खुश होते हुए कहा, “हमारी संतोष से फोन पर बात हुई है, अभी वह अस्पताल में है। आज हमने दिवाली मनाई है।।। हम केंद्र सरकार और बचाव कर्मियों का धन्यवाद करते हैं।”

वहीं पश्चिम बंगाल के कूच बिहार में भी उत्तरकाशी के सिल्कयारा सुरंग से बचाए गए श्रमिकों में से एक श्रमिक के परिवार ने उनके सफलतापूर्वक बचाए जाने की सूचना मिलने के बाद जश्न मनाया। यही असम के कोकराझार में भी हुआ।

इस बात पर कूच बिहार श्रमिक माणिक तालुकदार के बेटे ने कहा, “हमें बहुत खुशी है कि वे सुरंग से बाहर निकल गए।17 दिन हमें बहुत ही चिंता थी। अभी वे(माणिक तालुकदार) ठीक हैं।”

इधर लखीमपुर खीरी से बचाए गए श्रमिक मंजीत की मां ने कहा, “हम बहुत खुश हैं, हमने आज दिवाली मनाई है। हमारा एक ही बेटा है। 17 दिन कैसे बीते हैं यह सिर्फ भगवान और हम ही जानते हैं। 17 दिन हमारे लिए अंधेरा था, आज उजाला हुआ है। मैं केंद्र और राज्य सरकार का धन्यवाद करती हूं।”

देखा जाए तो उत्तरकाशी की टनल में फंसे मजदूरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनका धैर्य बनाए रखने की ही थी, लेकिन 17 दिन तक वह लगातार इस कठिन परीक्षा में पास हुए। सुरंग से बाहर निकलते वक्त सभी 41 मजदूरों के खिलखिलाते चेहरे उस जीत के गवाह थे जो वे जैसे हर पल मौत से दो-दो हाथ लड़कर जीते थे। 

सिर्फ इन बचाए गए मजदूर ही नहीं सलाम तो उन रक्षकों को भी किया जाना चाहिए तो इन कठिन और दुरूह 17 दिनों तक बिना रुके, बिना थके फंसे मजदूरों को बचाने के लिए जुटे रहे। उनके सामने मुश्किलों से भरा और थका देने वाला पहाड़ था, फिर पल-पल पर अनेकों बाधाएं भी तो थीं, लेकिन न डिगे न हौसला छोड़ा और सबने मिलकर मुश्किलों का पहाड़ चीर सभी 41 जिंदगियां बचा लीं। 

वो कहते हैं न कि, ‘जीत-हार’ दरअसल आपकी सोच पर ही तो निर्भर होती है। अगर मान लो तो ‘हार’ है, लेकिन साहस, संयम और धैर्य के साथ ठान लो तो जीत निश्चित है। यहां 17 दिनों तक चली यह जंग और कुछ नहीं बस साहस, संयम और धैर्य के मजबूत धागों के ताने-बाने की ही तो कहानी है,जो पहाड़ का सीना को चीर कर लिखी गई है।