भारतरत्न विनोबा भावे की जयंती पर जानें उनके अनमोल विचार

    महाराष्ट्र राज्य अपने उन महान विचारकों, समाज सुधारकों, संतों के कारण जाना जाता है, जिन्होंने अपने कार्यों, विचारों एवं जीवन दर्शन से अपने देश को नहीं, पुरे विश्व को भी नयी प्रेरणा व विचार शक्ति दी है। ऐसे ही संत, समाज सुधारक, राजनीतिज्ञ, शैक्षिक दर्शन के लिए पहचाने जाने वाले भारतरत्न विनोबा भावे की आज 126वीं जयंती है।

    आचार्य विनोबा भावे भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता और गांधीवादी नेता थे। आचार्य विनोबा भावे का मूल नाम विनायक नरहरी भावे था। वे महात्मा गांधी के विचारों के समर्थक थे। उनके पदचिन्हों पर चलते हुए उन्होंने देश में सामाजिक परिवर्तन लाने के उद्देश्य से ‘सर्वोदय समाज’ की स्थापना की। भूमि सुधार हेतु उनके द्वारा 1951 में ‘भूदान आंदोलन’ चलाया गया। इस आंदोलन के जरिए उनकी दुनिया भर में प्रशंसा होने लगी। वहीं उनके द्वारा महाराष्ट्र में ‘पवनार आश्रम’ की स्थापना की गई। 

    विनोबा भावे ने 1940 में प्रथम सत्याग्रही के रूप में अपना भाषण पवनार में दिया था। 9 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के सिलसिले में जेल भी गए थे। 9 जुलाई 1945 को जेल से रिहा होकर विनोबा ने पवनार आश्रम का भार पुन: अपने कन्धों पर ले लिया। 15 अगस्त को आजादी मिलते ही बंगाल में दीन-दुखियों के कष्ट निवारण के लिए निकल पड़े थे। 

    उन्होंने 1960 में चंबल के डाकुओं का आत्मसमर्पण करवाया। 1974 को अखिल भारतीय स्त्री सम्मेलन में भाग लेते हुए स्त्री शक्ति के महत्व का लोगों को ज्ञान कराया। उन्होंने 25 दिसंबर 1974 को मौन व्रत धारण किया, साथ ही गौवध के विरोध में अनशन भी किया था। अनशन के दौरान उनकी तबियत बिगड़ते देखकर मोरारजी देसाई ने पशु संवर्धन को केंद्रीय सूची में शामिल किया था।

    उन्होंने गांधी के सच्चे अनुयायी, मद्य निषेध तथा सामाजिक बुराइयों के लिए निरन्तर संघर्ष करते हुए अपने भूदान आंदोलन को जारी रखा था। उन्होंने ‘मैत्री’ तथा महाराष्ट्र धर्म नामक पत्रिका का संपादन भी किया था। 

    पवनार आश्रम में रहते हुए 15 नवंबर 1982 में अपने शरीर का त्याग कर दिया। विनोबा को साल 1958 में प्रथम रेमन मैग्सेसे पुरस्कार दिया गया। उन्हें मरणोपरांत भारत सरकार ने 1983 में भारत रत्न दिया।  

    हम अपने लड़कपन को पुनः नहीं पा सकते, हमारा बचपन ऐसा है जैसे स्लेट पर कुछ लिखा औए उसे मिटा दिया। 

    -आचार्य विनोबा भावे