कोरोना जांच कराने उमड़ी शिक्षकों की भारी भीड़

  • अस्पताल की व्यवस्था चरमराई
  • परिसर में अफरा-तफरी का माहौल
  • सोशल डिस्टेंसिंग की उड़ाई गईं धज्जियां
  • शिक्षकों ने बनाई अस्पताल प्रांगण में चौपाल

-वाहिद काकर

धुलिया. राज्य सरकार के आदेश के बाद शहर के सरकारी व प्राइवेट स्कूल सोमवार से खुलेंगे. कोरोना परीक्षण कराने के लिए ज़िला अस्पताल में विद्यालयों के अध्यापकों की भीड़ बड़े पैमाने पर उमड़ रही है. धुलिया जिला अस्पताल में एक प्रकार से गुरुवार को जुलूस का स्वरूप नजर आया. इस दौरान अध्यापकों ने जमकर सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाईं, वहीं  प्रशासन मूकदर्शक बनकर सारा खेल देखता रहा. इस मौके पर बड़े पैमाने पर अव्यवस्था फैल गई. पूरे देश में फैले कोरोना वायरस महामारी के बीच 23 नवंबर से स्कूलों को खोलने का निर्णय लिया गया है. लेकिन अभी भी कोरोना का कहर खत्म नहीं हुआ है, इसलिए स्कूलों को कुछ शर्तों के साथ खोला जा रहा है. हालांकि 9वीं से 12वीं कक्षा को शुरू करने का सरकार ने आदेश दिया है. लेकिन कोरोना जांच कराने के लिए प्राथमिक विद्यालयों के टीचर भी पहुंच गए, जिससे अस्पताल में भारी भीड़ जमा हो गई. बढ़ती भीड़ से अस्पताल परिसर में अफरी-तफरी का माहौल हो गया.

गाइड करने वाले कर्मी नदारद

गुरुवार की सुबह जिला सरकारी अस्पताल में क़रीब 4 से साढ़े 4 हजार शिक्षक और कर्मियों ने कोरोना परीक्षण कराने के लिए एक साथ ज़िला अस्पताल में दौड़ लगा दी, जिसके चलते ज़िला अस्पताल प्रांगण में शिक्षकों की क्लास लगी हुई थी. इस मौके पर बड़े पैमाने पर अव्यवस्था देखी गई. शिक्षकों को बैठने के लिए पर्याप्त संख्या में बेंच कुर्सियां तथा गाइड करने जिला अस्पताल के कर्मी नदारद थे. वहीं पर शिक्षकों ने जमकर सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाते हुए प्रांगण में चौपाल सजा रखी थी.

मरीजों ने भीड़ पर जताई नाराजगी

इसके चलते मरीजों ने नाराजगी का इजहार किया है और कहा कि शिक्षकों के कारण संक्रमण फैलने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है. प्रशासन की उदासीनता के कारण इकट्ठा चार से साढ़े 4000 शिक्षक और कर्मियों का कोरोना परीक्षण कराने बुलाया गया है जो कि सरासर गलत है.

जिला अस्पताल प्रशासन ने शिक्षकों को विद्यालय के अनुसार उन्हें समय देकर बुलाना चाहिए था या स्कूलों में ही परीक्षण कराने की व्यवस्था करानी थी. किंतु योजना के अभाव के चलते जिला अस्पताल में ही एक ही समय में इतनी सारी संख्या में शिक्षकों को बुलाकर परेशान तो किया ही गया. साथ ही मरीजों को भी परेशान किया गया है और संक्रमण फैलाने का कारण जिला अस्पताल तथा शिक्षा विभाग बना है. संबंधित दोषी कर्मियों पर कड़ी कार्रवाई करने की मांग भी मरीजों ने की है.

स्कूल खोलने का कोई औचित्य नहीं

स्कूल खोलने को लेकर अभिभावक कल्पना महाले ने बताया कि उनकी बेटी 8वीं कक्षा में पढ़ती है. जब तक कोरोना खत्म नहीं हो जाता, तब तक बेटी को स्कूल में नहीं भेजेंगे, क्योंकि अगर स्कूल में किसी एक बच्चे को कोरोना हुआ तो उसका कौन जिम्मेदार होगा. अभिभावक विजय डोंगरे ने कहा कि उनका बेटा 5वीं कक्षा में स्कूल में पढ़ता है. रोजाना बढ़ते कोरोना के केस को देखकर अब डर लगने लगा है. बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ नहीं कर सकते.

अभिभावक सुरेंद्र व कल्याणी ने कहा कि वे अपने लाडलों को अभी स्कूल भेजने को तैयार नहीं हैं. इस हालत में अभी बाहर रोज स्कूल भेजना तो बिल्कुल भी सुरक्षा की दृष्टि से सही नहीं है. अभिभावक नरेंद्र, सोनू व पूनम ने बताया कि वे बच्चों को स्कूल भेजने के पक्ष में नहीं हैं. कोरोना काल में स्कूल खोलना संक्रमण फैलने की वजह बन सकता है. संक्रमण के दौरान सरकार स्कूल खोलने की तैयारियां कर रही है जिसके लिए 23 नवंबर की तिथि निर्धारित की है. पेरेंट्स ने कहा कि कोरोना काल में आधा साल बीतने के बाद स्कूल खोलने का कोई औचित्य नहीं है. अगर कोई भी बच्चा कोरोना पॉजिटिव पाया गया तो उसका कौन जिम्मेदार होगा. कोरोना के लक्षण पाए जाने पर स्कूल के अन्य छात्रों में तेजी से संक्रमण बढ़ने के आसार हैं. ऐसे हालत में स्कूल नहीं खुलने चाहिए. सरकार के पास कोरोना संक्रमण रोकने के पुख्ता इंतजाम नहीं हैं. इस घड़ी में बच्चों को स्कूल भेजना उचित नहीं है.

जब 9वीं और 12वीं कक्षा शुरू करने का निर्णय लिया गया है तो प्राथमिक विद्यालयों के टीचरों को जिला अस्पताल में पहुंचने की क्या जरूरत थी. कोरोना टेस्ट तो कालेजों के अध्यापकों का होना था. अध्यापकों की संख्या अधिक होने से जिला अस्पताल में अफरा-तफरी मच गई. जिससे मरीजों को परेशानी हुई. आखिर अचानक भारी संख्या में अध्यापक कैसे पहुंच गए, इसकी जांच होनी चाहिए.