अधर में लटका मेलों का आयोजन, 450 वर्ष पुरानी परंपरा पर कोरोना का असर

  • पसोपेश में है स्थानीय प्रशासन
  • खानदेश की आय को लग सकता है बड़ा झटका
  • खानदेश में कोरोना वायरस की दूसरी लहर आने की आशंका

जलगांव. इस साल कोरोना संक्रमण के कारण खानदेश के ग्रामीण इलाकों की अर्थ व्यवस्था गड़बड़ाने की आशंका है. यहां के मेले की साढ़े चार सौ साल पुरानी परंपरा है पर इस बार कोरोना का असर देखा जा रहा है. जानवरों के मेलों के आयोजनों को लेकर स्थानीय प्रशासन पेसोपेश में है. जत्रा मेला के आयोजनों की रूपरेखा अभी तक निश्चित नहीं होने से ग्रामीणों में बेचैनी का माहौल है. वहीं अनेक परिवारों की जीविका के मुख्य स्रोत पर इस साल पानी फिरने की आशंका से व्यापारियों की चिंता बढ़ गई है. कोरोना बीमारी के जोखिम को देखते हुए तीर्थयात्रा, मेले रद्द किये जा सकते हैं. कोरोना की दूसरी लहर की आशंका से खानदेश में बड़े पैमाने में मेलों का आयोजन अधर में लटका है.

कार्तिकी एकादशी के बाद खानदेश में बड़े पैमाने पर मेले (यात्रोत्सव) शुरू होते हैं. खानदेश में एक लाख से अधिक व्यापारियों के लिए मेले आजीविका का मुख्य स्रोत हैं. वर्तमान परिदृश्य में कोरोना की दूसरी लहर को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है. शनिवार तक आधे से अधिक देश में फिर से लॉक डाउन लगा दिया गया है. इससे यह सुनिश्चित नहीं कहा जा सकता कि कोरोना की दूसरी लहर के बीच प्रशासन द्वारा मेलों को अनुमति दी जाएगी, की नहीं.

व्यापारियों की चिंता बढ़ी

इस वर्ष, कोरोना के कारण कहीं भी धार्मिक मेले नहीं लगे. इससे आने वाले वर्ष की आर्थिक व्यवस्था कैसे करें?यह सवाल व्यापारियों के साथ स्थानीय नागरिकों को सता रहा है. यात्रा के संबंध में अभी तक कोई बैठक नहीं हुई है. हर साल कार्तिकी के बाद, खानदेश में सबसे बड़ा मेला सारंगखेड़ा में लगता है.

चेतक महोत्सव का आयोजन

मेले के साथ ही चेतक महोत्सव पिछले पांच वर्षों से आयोजित किया जा रहा है. इसकी योजना के लिए जिला स्तरीय बैठक तीन महीने पहले आयोजित की जाती है. व्यापारियों के बीच भ्रम की स्थिति है क्योंकि कोरोना के कारण सारंगखेड़ा मेले को लेकर अब तक कोई बैठक नहीं हुई है.यहां के मेले की साढ़े चार सौ साल पुरानी परंपरा है. घोड़ों को खरीदने और बेचने के लिए देशभर से अश्व प्रेमी यहां आते हैं. मेले में देश भर के व्यापारी व्यापार के लिए आते हैं. यही वजह है कि इस बार मेला लगेगा या नहीं इसको लेकर व्यापारियों में भ्रम की स्थिति बनी हुई है.  

खानदेश में प्रसिद्ध मेले

खानदेश में सारंगखेड़ा के साथ विखरन,शिरपुर,आमली, बोरिस, तलोदा, शिंदे, मंदाने, मुडावद, बहादुरपुर, अमलनेर, धुलिया, चोरवड़, वायपुर आदि मेले प्रसिद्ध हैं. इसके अलावा, नवरात्र और चैत्र के महीने में एकवीरा देवी, पेडकाई देवी, मनुदेवी, बिजासनी देवी, धनदाईदेवी, इन्द्राक्षी देवी, धनाई पुनाई देवी, आशापुरीदेवी, भटाई देवी आदि मेले भी प्रसिद्ध हैं. इन मेलों के लिए बड़ी संख्या में लोग एक साथ आते हैं. इसलिए संक्रमण बढ़ने का डर है. यात्रोत्सव की अनुमति देने के लिए सरकार के निर्देशों का पालन करना होगा. सरकार इस संबंध में निर्णय क्या लेगी, इस पर सब की निगाहें टिकी हैं.

 -मिलिंद कुलकर्णी, तहसीलदार, शहादा

 मार्च के बाद से यात्रोत्सव और आनंद मेले बंद कर दिए गये हैं, इससे व्यापारियों पर भूखे रहने का समय आ गया है. महाराष्ट्र के अलावा गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार में आनंद मेले की अनुमति दी गई है. हालांकि, महाराष्ट्र में अनुमति नहीं दी गई है. संगठन ने अनुमति के लिए मंत्रालय को एक ज्ञापन सौंपा हुआ है.

-देवेंद्र चौधरी, अध्यक्ष, यात्रा व्यापारी संघ

यदि अगले कुछ दिनों में कोरोना का प्रकोप कम हो जाता है, तो कार्तिकी को त्योहार के बाद के तीर्थयात्राओं को लेकर सकारात्मक निर्णय लेने में सरकार को नियमों के अनुसार अनुमति देनी चाहिए, अगर अनुमति नहीं दी गयी तो ग्रामीण इलाकों की अर्थव्यवस्था का गणित बिगड़ने के कारण अनेक लोग बेरोजगार हो जाएंगे.

-मनोहर पाटिल, जलगांव