आदिवासियों का ‘बांबुलेन्स’ ही मात्र सहारा

  • आज भी नंदूरबार में मरीजों को अस्पताल पहुंचाने सड़क नहीं
  • सांसद, विधायक, मंत्री एवं प्रशासन की उदासीनता

जलगांव/नंदूरबार.  कोरोना महामारी की रोकथाम के लिए जिला प्रशासन ने कमर कसी है. कोरोना के अलावा देश में दूसरा कुछ नहीं है, ऐसा चित्र पूरे देश में है. इससे राज्य का आदिवासी जिला नंदूरबार भी अछूता नहीं है. किंतु यहां के आदिवासी अंचलों में स्वतंत्रता के 73 साल बाद भी एंबुलेंस उपलब्ध नहीं होने के कारण अस्पताल पहुंचाने के लिए बांबुलेन्स (बांस की डोली) का सहारा लिया जा रहा है. उफान पर बहते पानी में बांबुलेन्स के जरिए मरीज को अस्पताल ले जाने की दिल दहला देनेवाली वास्तविकता संक्रमण काल में दिखाई दे रहा है. जिससे यहां के सांसद, विधायक, मंत्री एवं प्रशासन सभी कटघरे में खडे़ हैं. उनकी उदासीनता के चलते आदिवासी आज के आधुनिक युग में भी बांस की डोली पर 12 से 15 किलोमीटर तक मरीजों को ढोने पर विवश हैं. सरकारी बदली नेता बदले अधिकारी बदले लेकिन नंदूरबार के आदिवासी की हालत जस की तस बनी हुई है.

अस्पताल हैं, लेकिन स्वास्थ्य कर्मी नदारद

कई वर्षों से नंदूरबार जिले के कुपोषण, स्वास्थ्य सुविधाओं पर काम किया जा रहा है. किंतु बावजूद इसके उक्त सुविधा दिन ब दिन बदहाल होती नजर आ रही है. सालाना आदिवासी विकास के लिए हजारों करोड़ों का प्रावधान किया जाता है, किंतु नेता, अफसर और ठेकेदारों की मिलीभगत से जिले के आदिवासी नागरिकों को गंभीर मौलिक समस्याओं से जूझना पड़ रहा है. नंदूरबार जिले की कई तहसीलों में सड़क, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली आदि मौलिक सुविधाएं नहीं हैं. जिनमें प्रमुख रूप से स्वास्थ्य सुविधा काफी चर्चा में रहती है.

यहां अस्पताल है तो, डॉक्टर नहीं, डॉक्टरों का समय अनुसार ड्यूटी न करना गायब  रहना, अस्पताल बंद रहना आदि गंभीर समस्याएं हैं. पीडब्ल्यूडी जनप्रतिनिधि की उदासीनता के चलते  पहाड़ी इलाकों में अभी तक सड़क नहीं बनाई गई,  जिसके चलते पहाड़ी इलाकों में तो एंबुलेंस नसीब ही नहीं है. गर्भवती महिलाएं व बुजुर्ग व्यक्तियों को पहाड़-पट्टी, नदी – नहर से  रास्ते जान की बाजी लगाकर बांबुलेन्स के जरिए 10-15 किमी की पैदल दूरी तय कर अस्पताल पहुंचाया जाता है.

सुविधाओं के अभाव में कई गर्भवती महिलाएं तोड़ देती हैं दम

इसी कारण कई गर्भवती महिलाओं ने दम तोड़ दिया है. लेकिन इन गंभीर समस्याओं की ओर सांसद रत्न पुरस्कार से सम्मानित और डॉक्टर होने के बावजूद सांसद डा हिना गावित ध्यान नहीं दे रही हैं. वहीं राज्य के आदिवासी विकास मंत्री के जिले में ये हाल है. तो अन्य आदिवासी जिलों की हालत क्या होगी. इससे अनुमान लगाया जा सकता है.

राज्यपाल के गोद लेने के बावजूद नहीं सुधरी स्थिति

कई वर्षों से नंदूरबार ज़िले के नेता आदिवासी विकास के नाम पर खुद का घर भरने में लगे हैं. जिसका उदाहरण पूर्व आदिवासी विकास मंत्री डॉ. विजय कुमार गावित पर हजारों करोड़ों के भ्रष्टाचार के आरोपों से लग जाता है. इन पापों को छिपाने के लिए उन्होंने बीजेपी की गंगा में डुबकी लगाकर शुद्धि करण किया है.

इस तरह का आरोप स्थानीय नेता द्वारा भी लगाया गया था. नेता, अफसर व ठेकेदारों की मिलीभगत एवं कागजी विकास नंदूरबार के आदिवासी समुदाय के लिए मौत का कुआं साबित हो रही है, जबकि  राज्यपाल कोशियारी ने नंदूरबार के कुछ गांव को गोद लिया है. इसके बावजूद यहां की हालत सुधरने का नाम नहीं ले रही.

-वाहिद काकर