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    -सीमा कुमार

    समूचे देश में ‘गणेश चतुर्थी’ का महापर्व बड़े ही धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। वैसे तो हर महीने चतुर्थी तिथि को गणेश पूजा का विधान है। लेकिन, भादो महीने की शुक्ल पक्ष की  ‘गणेश चतुर्थी’ तिथि का अपना ही अलग महत्व है। 

    इस दिन नियम पूर्वक विधि-विधान के साथ भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की जाती है और उनकी अतिप्रिय दूर्वा घास भी उनको चढ़ाई जाती है। क्योंकि, बिना दूर्वा या दूब घास के गणेशजी की पूजा सफल नहीं होती है। आइए जानें आखिर बुद्धि और शुभता के देव भगवान गणेशजी की पूजा में दूर्वा घास का पौराणिक महत्व क्या है और इसके बिना पूजा अधूरी क्यों मानी जाती है।

    पौराणिक कथा के मुताबिक, अनलासुर नाम का एक राक्षस हुआ करता था। अनलासुर चारो तरफ आतंक फैला रखा था। इस दैत्य के आंतक से सारे देवी-देवता और ऋषि-मुनि बहुत ही परेशान थे। अनलासुर के सामने जो  जाता वह उसको सीधे निगल जाता। कोई भी देवता या मुनि अनलासुर को मार नहीं पा रहे थे। तब सभी देवता मिलकर अनलासुर के आंतक से त्रस्त होकर भगवान गणेश की शरण में गए। 

    भगवान गणेश ने अनलासुर को युद्ध में हराकर उसे निगल लिया था। अनलासुर को निगलने के कारण भगवान गणेशजी के पेट में बहुत जलन होने लगी थी। उनकी इस जलन को शांत करने के लिए मुनियों ने उन्हें खाने के लिए 21 गांठ की दूर्वा घास खाने में दी। इसे खाते ही भगवान गणेश के पेट की जलन शांत हो गई। तभी से भगवान गणेश की पूजा में उन्हें दूर्वा चढ़ाई जाने लगी।

    दूर्वा चढ़ाने के नियम

    मान्यता है कि गणपति को 21 दूर्वा लेकर चढ़ाना चाहिए और इन्हें दो-दो के जोड़े में चढ़ाना चाहिए।

    जब तक गणपति आपके घर पर विराजमान रहें, नियमित रूप से उन्हें दूर्वा जरूर अर्पित करें।

    दूर्वा घास (दूब घास) चढ़ाने के लिए किसी साफ जगह से ही तोड़े और चढ़ाने से पहले भी इसे पानी से अच्छी तरह से धो लें।

    दूर्वा के जोड़े चढ़ाते समय गणपति के 10 मंत्र जरूर बोलना चाहिए –

    ॐ गणाधिपाय नमः

    ॐ उमापुत्राय नमः

    ॐ विघ्ननाशनाय नमः

     ॐ विनायकाय नमः

     ॐ ईशपुत्राय नमः

     ॐ सर्वसिद्धिप्रदाय नमः

     ॐ एकदंताय नमः

     ॐ इभवक्त्राय नमः

     ॐ मूषकवाहनाय नमः

     ॐ कुमारगुरवे नमः