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    -सीमा कुमारी 

    हिंदू धर्म में ‘पितृ पक्ष’ का बड़ा महत्व है। हर साल भादो महीने की पूर्णिमा तिथि से ‘पितृ पक्ष’ शुरू होता है और यह आश्विन महीने की अमावस्या तक चलता है। इस वर्ष श्राद्ध 20 सितंबर से यानि आज से शुरू होकर 06 अक्टूबर तक चलेंगे।  

    मान्यताओं के मुताबिक, पितृगण हमारे लिए देवतुल्य होते हैं, इस कारण से ‘पितृ पक्ष’ में पितरों से संबंधित सभी तरह के कार्य करने पर वे हमें अपना आशीर्वाद देते हैं। मान्यताएं हैं कि पितर के प्रसन्न होने पर देवतागण भी हमसे प्रसन्न होते हैं। ‘पितृ पक्ष’ के दौरान पूर्वजों का तर्पण नहीं करने हम पर ‘पितृदोष’ लगता है। ऐसे में आइए जानें  इस साल के ‘पितृ पक्ष’ में श्राद्ध की महत्वपूर्ण तिथियां कौन-कौन सी हैं –

    श्राद्ध पक्ष की तिथियां-

    पूर्णिमा श्राद्ध – 20 सितंबर

    प्रतिपदा श्राद्ध – 21 सितंबर 

    द्वितीया श्राद्ध – 22 सितंबर 

    तृतीया श्राद्ध – 23 सितंबर 

    चतुर्थी श्राद्ध – 24 सितंबर 

    पंचमी श्राद्ध – 25 सितंबर 

    षष्ठी श्राद्ध – 27 सितंबर 

    सप्तमी श्राद्ध – 28 सितंबर 

    अष्टमी श्राद्ध- 29 सितंबर

    नवमी श्राद्ध – 30 सितंबर 

    दशमी श्राद्ध – 1 अक्तूबर 

    एकादशी श्राद्ध – 2 अक्तूबर 

    द्वादशी श्राद्ध- 3 अक्तूबर 

    त्रयोदशी श्राद्ध – 4 अक्तूबर 

    चतुर्दशी श्राद्ध- 5 अक्तूबर

    सोलहवां दिन-

    अमावस्या श्राद्ध, अज्ञाततिथिपितृ श्राद्ध, सर्वपितृ अमावस्या, पितृविसर्जन महालय समाप्ति: 06 अक्टूबर  

    * ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, पितृपक्ष में पूर्वजों का स्मरण और उनकी पूजा करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। जिस तिथि पर हमारे परिजनों की मृत्यु होती है उसे श्राद्ध की तिथि कहते हैं। बहुत से लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि याद नहीं रहती ऐसी स्थिति में शास्त्रों में इसका भी निवारण बताया गया है। शास्त्रों के मुताबिक, यदि किसी को अपने पितरों के मृत्यु की तिथि मालूम नहीं है तो ऐसी स्थिति में ‘आश्विन अमावस्या’ को तर्पण किया जा सकता है। इसलिये इस अमावस्या को ‘सर्वपितृ अमावस्या’ कहा जाता है।

    इसके अलावा यदि किसी की अकाल मृत्यु हुई हो तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है। ऐसे ही पिता का श्राद्ध अष्टमी और माता का श्राद्ध नवमी तिथि को करने की मान्यता है।

    * पौराणिक कथा

    ऐसा माना जाता है कि, जब ‘महाभारत’ के युद्ध में दानवीर कर्ण का निधन हो गया और उनकी आत्मा स्वर्ग पहुंच गई, तो उन्हें नियमित भोजन की बजाय खाने के लिए सोना और गहने दिए गए। इस बात से निराश होकर कर्ण की आत्मा ने इंद्र देव से इसका कारण पूछा। तब इंद्र ने कर्ण को बताया कि आपने अपने पूरे जीवन में सोने के आभूषणों को दूसरों को दान किया लेकिन कभी भी अपने पूर्वजों को नहीं दिया। तब कर्ण ने उत्तर दिया कि वह अपने पूर्वजों के बारे में नहीं जानते थे। उसे सुनने के बाद, भगवान इंद्र ने उसे 15 दिनों की अवधि के लिए पृथ्वी पर वापस जाने की अनुमति दी, ताकि वह अपने पूर्वजों को भोजन दान कर सके। इसी 15 दिन की अवधि को पितृ पक्ष के रूप में जाना जाता है।