आज है ‘प्रबोधिनी एकादशी’ जानें इससे जुड़ी पौराणिक कथा और महत्व

    नई दिल्ली: आज ‘प्रबोधिनी एकादशी’ (Prabodhini Ekadashi) है। यह सभी महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक होती है। इस दिन व्रत किया जाता है। साथ ही विधि विधान के साथ पूजा पाठ की जाती है। अपने पति और बेटों के लंबी उम्र के लिए और खुशहाल जीवन के लिए महिलाएं ये व्रत करती है। मान्यता है कि ‘प्रबोधिनी एकादशी’ का व्रत करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। 

    बता दें कि ‘प्रबोधिनी एकादशी’ को कई अलग नामों से भी जाना जाता है। इसे उठनी एकादशी, अजा एकादशी, कहा जाता है। आपको बता दें कि यह व्रत भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी को प्रबोधिनी, जया, कामिनी तथा अजा एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी सभी 24 एकादशीयो में से एक है जो अपने आप में बड़ा ही महत्व रखती है। इस दिन भगवान विष्णु जी की पूजा की जाती है और रात्रि को जागरण किया जाता है। इस व्रत को रखने से सभी पाप नष्ट हो जाते है। साथ ही सुख-समृद्धि बनी रहती है। 

    ‘प्रबोधिनी एकादशी’ की पौराणिक कथा 

    पुराणों में कहा गया है कि एक बार सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने स्वप्न में ऋषि विश्वामित्र को अपना राज्य दान कर दिया है। अगले दिन ऋषि विश्वामित्र दरबार में पहुंचे तो राजा हरिश्‍चन्‍द्र ने अपना सारा राज्‍य उन्हें सौंप दिया। ऋषि ने दक्षिणा में राजा से पांच सौ स्‍वर्ण मुद्राए और मांगी। दक्षिणा चुकाने के लिए राजा ने अपनी पत्नी व पुत्र तथा स्वयं को बेचना पड़ा।

    राजा हरिश्‍चन्‍द्र को एक डोम ने खरीदा था। उस डोम ने राजा हरिश्‍चन्‍द्र को श्मशान में नियुक्त करके मृतकों के सम्बन्धियों से कर लेकर शव का दाह करने का कार्य सौंपा था। राजा को यह कार्य करते हुए कई वर्ष व्यतीत हो गए, तो एक दिन अकस्मात् उनकी गौतम ऋषि से भेंट हो गई। तब राजा से गौतम ऋषि ने उसकी यह हालत का कारण पूछा तो राजा हरिश्‍चन्‍द्र ने अपने ऊपर बीती सब बातें सुनाई।

    राजा हरिश्‍चन्‍द्र कि बात सुनकर गौतम मुनि ने उसे अजा एकादशी (प्रबोधिनी) व्रत Aja Ekadashi Vrat करने को कहा और वहा से चले गऐ। हरिश्‍चन्‍द्र राजा ने यह व्रत करना आरम्भ कर दिया। राजा को यह व्रत करते हुए कई वर्ष व्यतीत हो गये, इसी बीच उनके पुत्र रोहिताश का सर्प के डसने से स्वर्गवास हो गया। जब उसकी माता तारा अपने पुत्र का अंतिम संस्कार हेतु श्मशान पर लायी तो राजा हरिश्‍चन्‍द्र ने उससे श्मशान का कर मॉंगा।

    किन्तु उसके पास श्मशान का कर चुकाने के लिए कुछ भी नहीं था। उसने अपनी चुन्दरी का आधा भाग देकर श्‍मशान का कर चुकाया। इसके बाद वह अपने पुत्र की चिता को अग्नि देने के लिए आगे बढ़ी तो अचानक आकाश में बिजली चमकी और भगवान विष्णु जी प्रकट होकर बोले ” हे राजन” तुमने सत्‍य को जीवन में धारण करके उच्चतम आदर्श प्रस्तुत किया है।

    तुम्हारी इस कर्तव्य और निष्ठा धन्‍य को देखकर मैं तुम पर प्रसन्न हुआ। इसलिए तुम्हें इतिहास में जब तक जीवन है तब तक सत्यवादी राजा हरिश्‍चन्‍द्र के नाम से अमर रहोगे। इसके बाद भगवान अर्थ ध्‍यान हो गये और उनका पुत्र रोहित जीवित हो गया। तब ऋषि विश्वामित्र ने उनको उनका राज्य वापस लौटा दिया और तीनो चिरकाल तक सुख भोग कर अंत में स्वर्ग को चले गए।

    इसी तरह जो भी अजा एकादशी व्रत ‘प्रबोधिनी एकादशी'(Prabodhini Ekadashi Vrat) (Aja Ekadashi Vrat) पूरी श्रद्धा भाव से करता है वह इस संसार में सभी सुख भोग कर अंत में भगवान के चरण कमलों में स्‍थान प्राप्‍त करता है।