महासप्‍तमी के दिन करें ‘मां कालरात्रि’ की पूजा, ‘इसका’ चढ़ाएं प्रसाद देवी होंगी प्रसन्न

    -सीमा कुमारी

    मंगलवार, 12 अक्टूबर को ‘शारदीय नवरात्रि’ का सातवां दिन है। यानी, मां ‘कालरात्रि’ का दिन है, नवरात्रि के सातवें दिन देवी दुर्गा के सातवें स्वरूप ‘मां कालरात्रि’ की पूजा-  अर्चना की जाती है।  ज्योतिष-शास्त्र के अनुसार, दुर्गा मां की पूजा का सातवां दिन भी नवरात्रि के दिनों में बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। सदैव शुभ फल देने के कारण इनको ‘शुभंकरी’ भी कहा जाता है।

    कहा जाता है कि ‘मां कालरात्रि’ की पूजा करने से काल का नाश होता है। मां के इस स्वरूप को वीरता और साहस का प्रतीक भी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि ‘मां कालरात्रि’ की कृपा से भक्त हमेशा भयमुक्त रहता है, उसे अग्नि, जल, शत्रु आदि किसी का भी भय नहीं होता। आइए जानें ‘मां कालरात्रि’ की पूजा-विधि और महिमा

    पूजा-विधि

    मान्यताओं के मुताबिक, नवरात्रि के सप्तम दिन ‘मां कालरात्रि’ की पूजा करने से जातक के समस्त शत्रुओं का नाश होता है। माता की पूजा पूर्णतया: नियमानुसार शुद्ध होकर एकाग्र मन से की जानी चाहिए। माता काली को गुड़हल का पुष्प अर्पित करना चाहिए। कलश पूजन करने के उपरांत माता के समक्ष  दीपक जलाकर रोली, अक्षत से तिलक कर पूजन करना चाहिए और मां काली का ध्यान कर वंदना श्लोक का उच्चारण करना चाहिए। 

    इसका लगाएं भोग 

    तत्पश्चात मां का स्तोत्र पाठ करना चाहिए। ‘मां कालरात्रि’ को गुड़ बहुत प्रिय है, इसलिए ‘महासप्‍तमी’ (Maha Saptami) के दिन उन्‍हें इसका भोग लगाना शुभ माना जाता है। मान्‍यता है कि मां को गुड़ का भोग चढ़ाने और ब्राह्मणों को दान करने से वह प्रसन्‍न होती हैं और सभी विपदाओं का नाश करती हैं।

    पसंद है गुड़हल का फूल

    ज्योतिष-शास्त्र के अनुसार, माता काली एवं ‘कालरात्रि’ को गुड़हल का फूल बहुत पसंद है। इन्हें 108 लाल गुड़हल का फूल अर्पित करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। साथ ही जिन्हें मृत्यु या कोई अन्य भय सताता हो, उन्हें अपनी या अपने सम्बन्धी की लंबी आयु के लिए ‘मां कालरात्रि’ की पूजा लाल सिन्दूर व ग्यारह कौड़ियों से सुबह प्रथम पहर में करनी चाहिए। ‘मां कालरात्रि’ की इस विशेष पूजा से जीवन से जुड़े समस्त भय दूर हो जाएंगे। 

    कथा

    ‘कालरात्रि’ को मां काली का ही रूप माना जाता है। काली मां इस कलियुग मे प्रत्यक्ष फल देने वाली हैं। काली, भैरव तथा हनुमान जी ही ऐसे देवी-देवता हैं, जो शीघ्र ही जागृत होकर भक्त को मनोवांछित फल देते हैं। काली के नाम और रूप अनेक हैं। किन्तु, लोगों की सुविधा और जानकारी के लिए इन्हें भद्रकाली, दक्षिण काली, मातृ काली और महाकाली भी कहा जाता है। 

    ‘दुर्गा सप्तशती’ में महिषासुर के वध के समय मां भद्रकाली की कथा वर्णन मिलता है कि युद्ध के समय महाभयानक दैत्य समूह देवी को रण भूमि में आते देखकर उनके ऊपर ऐसे बाणों की वर्षा करने लगा, जैसे बादल मेरूगिरि के शिखर पर पानी की धार की बरसा रहा हो। तब देवी ने अपने बाणों से उस बाण समूह को अनायास ही काटकर उसके घोड़े और सारथियों को भी मार डाला। साथ ही उसके धनुष तथा अत्यंत ऊंची ध्वजा को भी तत्काल काट गिराया। धनुष कट जाने पर उसके अंगों को अपने बाणों से बींध डाला। और भद्रकाली ने शूल का प्रहार किया। उससे राक्षस के शूल के सैकड़ों टुकड़े हो गये, वह महादैत्य प्राणों से हाथ धो बैठा।