नवरात्री के पांचवें दिन करें ‘स्कंदमाता’ की पूजा, बनी रहेगी सुख-शांति, जानें विधि और महिमा

    -सीमा कुमारी

    इस साल ‘शारदीय नवरात्रि’ की पंचमी तिथि 10 अक्टूबर रविवार को है। यह नवरात्र का पांचवां दिन है। इस दिन मां दुर्गा के ‘स्कंदमाता’ स्वरूप की पूजा होती है। कहा जाता है कि मां स्कंदमाता की पूजा से भक्तों की सभी प्रकार की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। संतान प्राप्ति के लिए मां दुर्गा के स्कंदमाता की आराधना करना विशेष फल प्रदान करने वाला माना गया है। माता को लाल रंग प्रिय है इसलिए इनकी आराधना में लाल रंग के पुष्प जरूर अर्पित करना चाहिए।

    स्कंद कुमार कार्तिकेय की माता होने के कारण भी इन्हें ‘स्कंदमाता’ नाम से भी जाना जाता है। भगवान स्कंद देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति थे। मान्यता है कि इनकी पूजा से संतान सुख की भी प्राप्ति होती है। देवी के इस स्वरूप में भगवान स्‍कंद बालरूप में माता की गोद में विराजमान हैं। आइए जानें मां ‘स्कंदमाता’ की पूजा विधि और कथा

    पूजा-विधि

    मान्यताओं के मुताबिक, सुबह उठकर जल्गी स्नान कर लें, फिर पूजा के स्थान पर गंगाजल डालकर उसकी शुद्धि कर लें। फिर ‘स्कंदमाता’ की तस्वीर स्थापित करें। अगर माता के इस स्वरूप की प्रतिमा नहीं है तो आप मां पार्वती की प्रतिमा की भी पूजा कर सकते हैं। कलश की पूजा करें। इसके बाद स्‍कंदमाता को रोली-कुमकुम लगाएं और नैवेद्य अर्पित करें। माता के मंत्रों का जाप कर नवरात्रि के पांचवें दिन की कथा सुनें। धूप-दीपक से मां की आरती उतारें और स्कंदमाता को केले का भोग लगाएं। इसके साथ ही खीर और सूखे मेवे का भी भोग लगाया जा सकता है।

    स्कंदमाता की कथा

    मान्यताओं के अनुसार,  तारकासुर नाम के एक राक्षस ने भगवान ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उसकी तपस्या कठोर से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे दर्शन दिए। तारकासुर ने ब्रह्मा जी से अमरता का वरदान मांगा। इस पर ब्रह्मा जी ने तारकासुर को समझाया कि जिसने जन्म लिया है। उसको एक दिन मरना ही पड़ेगा। इस पर तारकासुर ने शिवजी के पुत्र के हाथों मृत्यु का वरदान मांगा, क्योंकि वह सोचता था कि शिवजी का कभी विवाह नहीं होगा और विवाह नहीं से पुत्र भी नहीं होगा। ऐसे में उसकी मृत्यु भी नहीं होगी।

    वरदान मिलने पर तारकासुर जनता पर अत्याचार करने लगा और लोग ने शिवजी के पास जाकर तारकासुर से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। फिर शिवजी ने पार्वती से विवाह किया और कार्तिकेय पैदा हुए। कार्तिकेय ने बड़ा होने पर राक्षस तारकासुर का वध किया। भगवान स्कंद यानि कार्तिकेय की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। पुराणों में स्कंदमाता की कुमार और शक्ति नाम से महिमा का वर्णन है।