कांजुरमार्ग कारशेड को लेकर हाईकोर्ट ने कही यह बात

मुंबई. मेट्रो-3 के कारशेड (Metro-3 Car shed) पर चल रहे वाद विवाद पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट (High Court) ने केंद्र और राज्य सरकार दोनों पर तल्ख़ टिप्पणी की है और कहा है कि मेट्रो प्रोजेक्ट (Metro project) जनता के पैसे से है और जगह भी जनता की है, पर आप दो पक्षों की आपसी लड़ाई में जनता पिस रही है। एक-दूसरे के खिलाफ खुद को खड़ा करने के लिए फटकार लगाते हुए कोर्ट ने कहा कि यह अफसोसजनक है कि अभी यह तय नहीं किया जा सका है कि कंजूर मार्ग प्लाट केंद्र सरकार का है या राज्य सरकार का। मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता ने स्पष्ट किया कि यह परियोजना लोगों के हित में की जा रही है और यह लोगों के पैसे से उनके स्थान पर किया जाएगा।

क्या राज्य सरकार अपने दस्तावेज़ों का खंडन कर सकती है ?

कोर्ट के इस लहजे से मेट्रो कारशेड (Metro Carshed) के लिए कांजुर मार्ग की 102 एकड़ जमीन के विषय में राज्य सरकार के मालिकाना हक होने से जुड़ा दावा तूल पकड़ता जा रहा है। हाईकोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि इस विषय से जुड़े राजस्व रिकार्ड जमीन को लेकर केंद्र सरकार के मालिकाना हक की तस्दीक करते हैं और क्या महाराष्ट्र सरकार इस मामले से जुड़े अपने दस्तावेजों का खंडन कर सकती है। इस तरह से मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता व न्यायमूर्ति गिरीष कुलकर्णी की खंडपीठ ने राज्य सरकार के जमीन के मालिकाना को लेकर राज्य सरकार के दावे पर सवाल उठाए। खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान विशेष रुप से जमीन के मालिकाना हक को लेकर मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण (MMRDA) व नगर विकास विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव की ओर से लिखे गए पत्रों तथा राजस्व  रिकार्ड का जिक्र किया।

जमीन का मालिकाना हक 1981 से राज्य सरकार के पास

हालांकि इस दौरान राज्य के महाधिवक्ता आशुतोष कुंभकोणी ने कहा कि जब यह पत्र लिखे गए थे उस समय जमीन के मालिकाना हक से जुड़ा कोई विषय नहीं था। उन्होंने कहा कि कांजुर मार्ग की जमीन का मालिकाना हक 1981 से राज्य सरकार के पास है। यह जमीन कभी किसी विवाद का हिस्सा नहीं था और राज्य सरकार के पास काफी पहले से यह जमीन है। इस पर खंडपीठ ने इस विषय से संबधित नगरविकास विभाग के तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव के पत्र का जिक्र किया और जमीन से जुड़े राजस्व रिकार्ड के आधार पर कई सवाल उठाए।

खंडपीठ के सामने केंद्र सरकार की ओर से मेट्रो के कारशेड के लिए कांजुरमार्ग की जमीन स्थानांतरिक किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई चल रही है। याचिका में केंद्र सरकार ने दावा किया है कि कांजुरमार्ग की खार जमीन पर मालिकाना हक उसका है और राज्य सरकार ने अवैध तरीके से जमीन का स्थनांतरण किया है, इसलिए जमीन स्थनांतरण से जुड़े 1 अक्टूबर 2020 के निर्णय को रद्द कर दिया जाए।

स्वामित्व केंद्र सरकार के पास काफी पहले से

केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सालिसिटर जनरल अनिल सिंह ने पक्ष रखते हुए दलील दी कि जमीन का स्वामित्व केंद्र सरकार के पास काफी पहले से है। एमएमआरडीए ने एक पत्र में इसे स्वीकार किया है और उसने जमीन लेने के एवज में बजार भाव से रकम देने की भी पेशकश की थी। पहले मेट्रो कारशेड आरे में बनना था बाद में इसे कांजुरमार्ग में बनाना तय किया गया है। इस बीच एमएमआरडीए की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि एमएमआरडीए के लिए मेट्रो कारशेड की जमीन काफी महत्वपूर्ण है। कारशेड बनने के बाद ही मेट्रो की चार लाइन शुरु हो सकेगी। खंडपीठ ने फिलहाल मामले की सुनवाई 14 दिसंबर 2020 तक के लिए स्थगित कर दी है।