Chhattisgarh Agriculture Minister Ravindra Choubey special discussion with Navbharat

  • किसान हुए कर्जमुक्त, बन रहे स्वावलंबी
  • सीधे जेब में भेजे 55,000 करोड़
  • 19 लाख किसानों को मिला लाभ
  • सिंचाई बढ़ाने करेंगे 40-50 हजार करोड़ का निवेश
  • निवेश बढ़ाने ‘बायर-सेलर मीट’

नागपुर. 7 राज्यों से घिरे छत्तीसगढ़ का मूल स्वभाव कृषि और किसान है. इस पर आधारित उद्योग के जरिए ही राज्य के विकास की संकल्पना थी. दुर्भाग्य से राज्य बनने के बाद 15 वर्षों तक भाजपा का शासन रहा. इस दौरान सरकार की प्राथमिकता माइन्स, मिनरल और उद्योग रही. नतीजतन राज्य के किसान हाशिये पर चले गए. अब जबकि कांग्रेस की सरकार आई है और महज 2 वर्षों में ही किसानों को कर्जमुक्त बनाने तथा समृद्धि की दिशा में बड़े-बड़े कदम उठाये जा रहे हैं. किसान और गांव समृद्ध होंगे तो राज्य में खुशहाली आएगी, इसी दृष्टिकोण को रखते हुए राज्य में 2 वर्षों में ही किसानों पर 55,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं. 10,000 करोड़ की कर्जमाफी दी गई है. लगभग 50,000 करोड़ का निवेश बुनियादी संरचनाओं, सिंचाई प्रोजेक्ट के विकास, डेयरी उद्योग, इथेनॉल एवं मक्का-गन्ना प्रोसेसिंग उद्योग आदि पर राज्य सरकार करेगी. इससे किसानों की स्थिति सबल होगी तथा वे पूर्ण रूप से कर्जमुक्त होंगे.

यहां देखें वीडियो: छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ नेता रवींद्र चौबे ने ‘नवभारत’ से चर्चा करते हुए कहा कि राज्य और देश…

छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता, 7 बार विधानसभा के सदस्य और राज्य के कृषि एवं बायो टेक्नोलॉजी, पशुधन व फिशरिज तथा जल संसाधन मंत्री रवींद्र चौबे ने ‘नवभारत’ से चर्चा करते हुए कहा कि राज्य और देश का विकास कृषि से होकर गुजरता है. हम जितना फोकस इन पर करेंगे, राष्ट्र विकसित होगा. कोरोना काल में जब अर्थव्यवस्था गर्त में है ऐसे समय में सभी की निगाहें, उम्मीदें पुन: कृषि पर टिक गईं हैं. राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इस दिशा में ठोस कदम उठा रहे हैं और निरंतर किसान और किसानों से जुड़ी योजनाएं पेश कर मिसाल पेश कर रहे हैं.

2,500 रुपये में धान की खरीदी:

चौबे ने कहा कि केंद्र के विरोध के बावजूद राज्य सरकार ने किसानों से 2,500 रुपये क्विंटल की दर से धान की खरीदी की. असंभव को हमने संभव बनाया. इस मद में 2 वर्ष में लगभग 40,000 करोड़ रुपये सीधे किसानों के खाते में डाले गए. अतिरिक्त धन मिलने से धान उत्पादक किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार आया. वे स्वावलंबन की ओर अग्रसर हुए. राजीव गांधी किसान न्याय योजना इसके लिए शुरू की गई है. केंद्र सरकार धान के लिए 1,895 रुपये देती है. चौबे कहते हैं कि राज्य में 19 लाख धान किसान पंजीकृत हैं. सीधे इनके खातों में धन जमा किया जाता है. वहीं केंद्र राज्य में 32 लाख किसान होने की बात करती है. अब यह संख्या धीरे-धीरे कम हो रही है और धन की आवक भी कम होने लगी है. केंद्र ने कागजात की जांच नहीं की, जबकि राज्य के पास किसानों के पुख्ता कागजात हैं. हवा में बात करने से कुछ नहीं होता.

गोबर खरीदने वाला पहला राज्य:

नई-नई परिकल्पनाएं और दूरदृष्टि के कारण ही राज्य में पहली बार गोबर खरीद योजना आरंभ की गई है. गोबर से गांवों में समृद्धि आएगी, क्योंकि गांवों में इससे अतिरिक्त धन आएगा. इसका लक्ष्य किसान, भूमिहीन एवं महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना है. कोई भी व्यक्ति गोबर लाकर स्वयं सहायता समूह को बेच सकता है. राज्य सरकार 2 रुपये किलो की दर से गोबर की खरीद कर रही है. सरकार इससे आर्गेनिक खाद बनाएगी और 8 रुपये किलो की दर से बेचेगी. गांवों की खेती में इस खाद का ही उपयोग होगा. 11,000 पंचायतों में से 5,000 पंचायतों में योजना आरंभ भी हो चुकी है. 4,300 खरीद केंद्रों में गोबर की खरीदी आरंभ हो गई है. इसका मकसद लोगों की जेब में अतिरिक्त धन उपलब्ध कराना है. ऐसा देखा जा रहा है कि भूमिहीन दिनभर गोबर जमाकर बेचने ला रहे हैं. ऐसे व्यक्ति भी इस माध्यम से महीने में 4,000 रुपये कमाई कर सकता है.

सिंचाई प्रोजेक्ट में निवेश:

आंकड़ों में 29 फीसदी जमीन सिंचित है, परंतु वास्तविकता से अलग है. सिंचाई क्षमता बढ़ानी है. कुछ विवाद ट्रिब्यूनल में है. समाधान की उम्मीद है. विवाद थमते ही 10-12 प्रोजेक्ट पर काम शुरू हो सकता है. आर्थिक रूप से सबल बनाने में ये परियोजनाएं कारगर साबित होंगी. इस क्षेत्र में 40-50 हजार करोड़ निवेश संभव है. गांव-गांव में पानी पहुंचाना सरकार का लक्ष्य है.

4 इथेनॉल प्लांट:

मुख्यमंत्री के नेतृत्व में राज्य में इथेनॉल क्रांति लाने की पहल आरंभ हो गई है. 4 प्रोजेक्ट के लिए हस्ताक्षर भी हो चुके हैं. गन्ने और मक्के से इथेनॉल बनाया जाएगा. अतिरिक्त आय का स्रोत बनेगा. सरकार चाहती है कि धान की भूसी से भी इथेनॉल बने. इसके लिए भी पहल है. मक्का और गन्ना किसानों को भी देश में सर्वाधिक भुगतान छत्तीसगढ़ में किया जा रहा है. छत्तीसगढ़ के मक्का किसानों को प्रति क्विंटल 355 रुपये का भाव दिया जा रहा है, जो देश में सर्वाधिक है. इसी प्रकार गन्ना किसानों को भी हम सर्वाधिक भुगतान कर रहे हैं.

विश्वविद्यालय-महाविद्यालय का जाल:

चौबे ने बताया कि राज्य में कृषि, फिशरिज, पशुपालन महाविद्यालय, विश्वविद्यालयों को पहले से सशक्त बनाया जा रहा है, वहीं नए-नए महाविद्यालय और विश्वविद्यालय की स्थापना भी की जा रही है ताकि युवावर्ग सीधे इस पेशे से जुड़ सकें. अच्छी बात यह है कि युवाओं को इस ओर आते हुए भी देखा जा रहा है. इन संस्थानों में स्थानीय जरूरतों के हिसाब से शोध भी हो रहे हैं जो मील के पत्थर साबित हो रहे हैं. उत्पादन, उत्पादकता और गुणवत्ता सुधारने में ये काफी कारगर साबित हो रहे हैं. इसी क्रम में उद्यानिकी, वानिकी विश्वविद्यालय भी स्थापित करने की पहल की गई है.

लॉजिस्टिक, वेयरहाउसिंग की मजबूती:

राज्य के किसानों की फसल को देश-विदेश के बाजारों तक पहुंचाने के लिए राज्य में लॉजिस्टिक, वेयरहाउसिंग को मजबूत बनाने के लिए अहम पहल की गई है. चौबे कहते हैं कि निवेशकों को पहले उद्योग लगाने को कहा गया है, कोई मंजूरी लेने की जरूरत उन्हें नहीं होगी. बाद में जो जरूरी होगा वो मंजूरी उन्हें दी जाएगी. कृषि आधारित उद्योग के लिए भी नियमों को शिथिल किया गया है ताकि इन सेक्टरों में निवेश बढ़े.

तोमर को भेजा प्रस्ताव:

चौबे ने बताया कि कुछ दिन पूर्व ही केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से बात हुई है. जब उन्हें राज्य की योजनाओं से अवगत कराया गया तब उन्होंने आश्वासन दिया है कि वे छत्तीसगढ़ के लिए मदद की राशि दोगुना करेंगे. इसमें मछली पालक, मुर्गी पालक, बकरी पालक, सुअर पालक, सब्जी उत्पादक, मशरुम उत्पादक, फल उत्पादक आदि को काफी लाभ होगा. बजट दोगुना होने का लाभ निश्चित रूप से छत्तीसगढ़ के ग्रामीण भागों को मिलेगा.

निजी निवेश को बढ़ावा:

निजी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए बायर-सेलर मीट का आयोजन किया गया था. 60 देशी और 18 विदेशी कंपनियों ने हिस्सा लिया था. ये निवेशकों की रुचि को दर्शाता है. कोरोना के कारण प्रगति नहीं हो पाई है परंतु हमें उम्मीद है कि इसका सुफल मिलेगा. इसके जरिए किसानों की फसल को अधिक कीमत दिलवाने की दिशा में बेहतर कार्य करने का मौका मिलेगा.

किसान विरोधी विधेयक:

केंद्र द्वारा लोकसभा में कृषि से संबंधित तीनों विधेयकों को उन्होंने किसान विरोधी बताया. चौबे ने कहा कि इससे किसानों का शोषण बढ़ेगा, कीमतों को लेकर अनिश्चितता बढ़ेगी और जमाखोरी को बढ़ावा मिलेगा और सबसे बड़ी बात यह कि इससे देश में पुन: एक बार ईस्ट इंडिया कंपनी को बढ़ावा मिलेगा. इन विधेयकों के जरिए किसानों के हाथ से जमीन जाएगी. वे कहते हैं कि इन कानूनों के आने से एम.एस.पी. का मॉडल ही खत्म हो जाएगा. निजी मंडियों में किसानों की खुली लूट मचेगी. स्टॉक सीमा हटाने से एक उद्योगपति माल की खरीदी कर पूरे बाजार को कंट्रोल कर सकता है. ऐसे में पूंजीपतियों की मनमानी हो जाएगी. इसलिए इस कानून का हर ओर विरोध हो रहा है और हमने भी अपनी राय भेज दी है.

साक्षात्कार: नीरज नंदन