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  • आर्थिक संकट से जूझ रहे परिवार

नागपुर. कोरोना ने आर्थिक व्यवस्था चौपट कर दी है. अब सभी की समझ में यह आने लगा है. खासकर निम्न मध्यम व मध्यम वर्ग के परिवारों पर इसका बेहद विपरीत परिणाम पड़ा है. कोरोना ने तो मारा ही है, लेकिन अब अनियंत्रित महंगाई लोगों की कमर तोड़ रही है. कोरोना ने निजी सेक्टर में कार्य करने वाले हजारों लोगों की नौकरी छीन ली है या फिर अभी भी वे कम वेतन पर कार्य करने को मजबूर हैं. उस पर महंगाई सिर चढ़कर बोल रही है.

महंगाई का असर पैसेवालों को भले ही नहीं पड़ रहा हो मगर नौकरीपेशा (सरकारी छोड़कर) और 10-20 हजार रुपये मासिक आय वाले परिवारों की कमर टूटती जा रही है. उन्हें अपने इलाज, मनोरंजन, उत्सव-त्योहार और आकस्मिक खर्चों के लिए पैसे का ‘जुगाड़’ (उधार) करने मजबूर होना पड़ रहा है. यही जुगत उन्हें कर्जदार बना रही है. राशन की क्वालिटी और सब्जी-भाजी में समझौता करने के बाद भी उन्हें घर चलाने में दिक्कतें आनी शुरू हो गई हैं. गृहिणियों में महंगाई के चलते आ रही आर्थिक दिक्कतों की चर्चा आम हो गई है. परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो गया है.

वेतन ही हो गया कम

एक निजी कम्पनी में सुपरवाइजर सुनील ठाकुर बताते हैं कि कोरोना लॉकडाउन के बाद 2 महीने कम्पनी ने वेतन दिया, लेकिन उसके बाद 50 फीसदी वेतन दिया गया. पहले ही इतना वेतन नहीं था कि कुछ बचत कर पाते. अब तो खर्च चलाने के लिए उधार लेने की नौबत आ रही है. एक तो वेतन कम मिल रहा है, ऊपर से पेट्रोल के भाव 90 रुपये के पार हो गया है. सब्जियों में फिलहाल कुछ राहत है लेकिन यह अधिक दिनों तक नहीं रहने वाली. खाने के तेल, दाल, चावल, गेहूं के भाव पिछले 2 वर्ष में काफी बढ़े हैं. वहीं एक कम्पनी में एकाउन्टेंट राजेश ने बताया कि अब तो 2 फर्मों में पार्टटाइम एकाउंटिंग का काम कर घर का खर्च चला रहे हैं.

पनीर 300 रुपये किलो, पेट्रोल 90 रुपये लीटर, फल्ली तेल 160 रुपये लीटर हो गया है. जनरल प्रैक्टिशनर डॉक्टरों ने भी अपनी फीस 500 से 800 रुपये कर दी है. अगर सर्दी-जुकाम भी हुआ तो 1000-2000 रुपये उड़ जाते हैं. निजी स्कूलों में फीस बढ़ा दी गई है. 2-3 फीसदी महंगाई यदि बढ़ती तो उतने ही वेतन में कुछ मदों में कम ज्यादा करके एडजस्ट किया जा सकता था मगर सीधे-सीधे 25-30 प्रतिशत का फर्क आ गया है. इसे कैसे कवर किया जा सकता है. अपना जीवन स्तर बरकरार रखने के लिए मजबूरी में पार्टटाइम नौकरी भी करनी पड़ रही है. नतीजा यह हो रहा है कि घर में बच्चों को समय नहीं दे पा रहे हैं.

सिलाई सीखकर शुरू किया काम

बाजीप्रभुनगर निवासी अंजली ने बताया कि अब परिवार का खर्च उठाना अकेले सदस्य की कमाई से संभव नहीं. पति एक निजी कम्पनी में सेल्स विभाग में काम करते हैं. 2 बच्चों की पढ़ाई का खर्च मुख्य है. महंगाई जिस तेजी से बढ़ी है पति का वेतन नहीं बढ़ा. सरकारी नौकरी वालों को फर्क नहीं पड़ता. उन्हें डीए अलाउंस वगैरह मिलता है. राशन की क्वालिटी से समझौता करना पड़ा है. चावल और गेहूं अब कम दाम वाले खरीद रहे हैं. दाल की मात्रा कम की है. फल्ली तेल की जगह सोयाबीन ले रहे हैं. सब्जियों में पसंद से भी समझौता करना पड़ रहा है. कर्जबाजारी करने से बेहतर कुछ माह पूर्व सिलाई क्लास में सिलाई सीखी. अब घर में ही वह काम कर कुछ आय हो रही है जिससे कुछ बैलेंस बना हुआ है. 

कर्ज लेने की मजबूरी

एक रिसर्च के अनुसार, 15-20 हजार रुपये मासिक आय वाले परिवारों को तो वर्षभर में अपनी वार्षिक आय का 20 फीसदी कर्ज लेना पड़ जाता है. वेतन आम जरूरतों में खर्च हो जाता है और आकस्मिक खर्च जैसे इलाज, मनोरंजन, भ्रमण, शादी-ब्याह, छोटे उत्सव आदि के लिए उसे जान-पहचान वालों से कर्ज लेना पड़ता है. इसकी पूर्ति के लिए या तो नौकरीपेशा वर्ग किसी और संस्था में पार्टटाइम जॉब कर रहा है या फिर उनकी पत्नी को नौकरी या कोई घरेलू व्यवसाय करना पड़ रहा है, क्योंकि उसके वेतन का 25 फीसदी भोजन, 35 फीसदी मकान किराया, 5 पानी-बिजली, 6 पेट्रोल, 10 स्कूल फीस, 3 मोबाइल, 4 चिल्लर, 5 कपड़ा, 4 मेहमानबाजी में खर्च हो जाता है.

अब यदि घर में कोई बीमार हुआ, किसी शादी- ब्याह उत्सव में शहर के बाहर जाना पड़ा, अन्य आकस्मिक खर्च आया तो उसके लिए उसे मित्रों-रिश्तेदारों की मदद लेनी पड़ रही है. हर वर्ष वार्षिक आय का लगभग 20 फीसदी तक कर्ज हो जाता है जिसे चुकाने के लिए उसे कहीं पार्टटाइम जॉब करना पड़ रहा है या फिर गृहिणियों को भी परिवार की आय बढ़ाने के लिए कहीं नौकरी या फिर घर में ही सिलाई-कढ़ाई-बुनाई-ट्यूशन आदि का काम शुरू करना पड़ रहा है. कोरोना महामारी के संकट ने इसे और बढ़ा दिया है.