बची टर्म फीस भरने पर ही पेपर की जांच, प्राइवेट स्कूलों का शुल्क वसूली का नया फंडा

    • 25-30 प्रश फीस कम की कुछ स्कूलों ने 
    • 100 करोड़ की वसूली पर लगा स्टे 
    •  5,000 रुपये बस का किराया भी हजम 

    नागपुर. वर्षभर चली ऑनलाइन क्लासेस की वजह से कई पालकों ने बच्चों की पूरी फीस नहीं भरी. वहीं कुछ स्कूलों ने पालकों की मांग पर इसमें 25-30 फीसदी तक कमी भी की. लेकिन अब भी कई स्कूल अपने अड़ियल रवैये पर अडिग हैं. शिक्षा राज्यमंत्री द्वारा आदेश जारी किये जाने के बाद भी स्कूल मानने को तैयार नहीं है. इस दिनों स्कूलों ने बची हुई टर्म फीस वसूलने का नया फंडा निकाला है.

    इसके तहत पिछले दिनों छात्रों को प्रश्न पत्र दिए गए थे जिन्हें घर पर ही हल करना था. अब जब पालक पेपर जमा करने जा रहे हैं तो शिक्षकों द्वारा बताया जा रहा है कि पहले बची हुई फीस जमा करो, उसके बाद ही पेपर का मूल्यांकन किया जाएगा. हालांकि इन पेपर्स से मुख्य परीक्षा का सीधा संबंध नहीं है लेकिन छात्रों को यह मालूम हो जाता था कि वे कहां कमजोर हैं.

    फीस को लेकर पालकों का संघर्ष पिछले वर्षभर से चल रहा है. कई संगठनों ने अब तक आंदोलन भी किया. शिक्षा विभाग से लेकर प्रधानमंत्री तक को पत्र भेजा लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ. हालांकि पहली से 9वीं तक के छात्रों के पालक फीस का टेंशन भी नहीं ले रहे हैं लेकिन 10वीं व 12वीं के पालक फंस गये हैं.

    कोर्ट के नाम पर डरा रहे 

    बोर्ड परीक्षा का वर्ष होने की वजह से पालक किसी भी तरह का जोखिम नहीं उठाना चाहते. पिछले वर्ष सिटी के कुछ स्कूलों का निरीक्षण किया गया. इनमें पाया गया था कि करीब 15 स्कूलों ने पालकों से अतिरिक्त वसूली की. इस मामले राज्यमंत्री बच्चू कड़ू ने स्कूलों से 100 करोड़ की वसूली करने और पालकों को लौटाने के आदेश दिए थे. इसके बाद शिक्षा विभाग ने भी सभी स्कू्लों को निर्देश दिए. लेकिन स्कूल प्रबंधन ने हाई कोर्ट की शरण ली.

    फिलहाल कोर्ट ने मामले में स्टे लगा दिया. इसी तरह का एक मामला मुंबई हाई कोर्ट में आया जिसमें कोर्ट ने 8 मई 2020 से पहले फीस स्ट्रक्चर जारी करने वाले स्कूलों को 50 फीसदी शुल्क वसूली के निर्देश दिए हैं. सिटी में मई के बाद ही स्कूलों में प्रवेश दिया गया. इसके बावजूद स्कूल प्रबंधन कोर्ट का हवाला देते हुए पालकों से सभी टर्म फीस भरने के लिए दबाव बना रहे हैं. 

    बस किराये की रकम भी हजम

    कोरोना का प्रभाव कम होने के बाद सिटी और ग्रामीण में स्कूल शुरू हुए. कोविड गाइड लाइन्स के अनुसार पालकों को ही बच्चों को स्कूल तक छोड़ना था. लेकिन ग्रामीण भागों में स्थित कुछ सीबीएसई स्कूलों ने प्रशासन के नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए बस और वैन सेवा शुरू की. इसके बदले पालकों से बस का किराया भरने को भी कहा गया. अनेक पालकों ने 5,000 रुपये भरे भी, लेकिन महीनाभर भी स्कूल नहीं चला. फिर से कोरोना का प्रभाव बढ़ने के बाद स्कूल बंद हो गए. अब स्कूलों का कहना है कि उनकी बसें खड़ी हैं. बसों का टैक्स और इन्श्योंरेंस भरना पड़ रहा है. इस हालत में उक्त फीस वापस नहीं की जाएगी. 

    अब प्रवेश पत्र के लिए अड़ाएंगे

    शुल्क वसूली के तरह-तरह के फंडे अपनाने का सिलसिला यहीं खत्म नहीं होने वाला है. बोर्ड के छात्रों को स्कूल से ही प्रवेश पत्र जारी किया जाता है. इसी प्रवेश पत्र के आधार पर छात्रों को परीक्षा केंद्र में प्रवेश मिलता है. जिन पालकों ने अब तक सभी टर्म फीस नहीं भरी है, उन्हें प्रवेश पत्र लेते वक्त अड़ाया जा सकता है. कोविड काल में ऑनलाइन क्लासेस होने से कोई भी अन्य एक्टिविटी नहीं ली गई.

    शिक्षकों ने घर से ही बच्चों की क्लासेस लीं. इतना ही नहीं, स्कूलों ने शिक्षकों की सैलरी भी आधी कर दी. कई कर्मचारियों को भी हटा दिया गया. इन सबके बावजूद फीस में कोई कमी नहीं की गई. स्कूलों की मनमानी से पालक परेशान हो गए हैं. लेकिन दुर्भाग्य यह रहा है कि प्रशासन द्वारा इसे अब तक गंभीरता से नहीं लिया.