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  • मंत्री, अधिकारियों के आदेश की भी परवाह नहीं

नागपुर. कोरोना मरीजों की समस्या को देखते हुए पिछले दिनों स्वास्थ्य मंत्री ने स्पष्ट निर्देश दिये थे कि मरीजों को अनाप-शनाप बिल न वसूला जाये. साथ ही पहले ही एडवांस रकम न मांगी जाये. लेकिन सिटी के कुछ निजी अस्पतालों को न ही किसी मंत्री के आदेश की परवाह है और न ही मनपा के अधिकारियों की. अब भी मरीज को भर्ती करने से पहले एडवांस के तौर पर 1 से 2 लाख रुपये जमा करना पड़ रहा है. इतना ही नहीं निजी अस्पतालों में बिल पर निगरानी के लिए रखे गये शासकीय प्रतिनिधियों की भूमिका पर भी संदेह व्यक्त किया जाने लगा है.

कोरोना मरीजों के उपचार को लेकर निजी अस्पतालों की मनमानी को लेकर गृहमंत्री अनिल देशमुख ने सख्ती बरतने के आदेश दिये थे. इतना ही नहीं अस्पतालों में जाकर स्थिति से अवगत होने के निर्देश भी अधिकारियों को दिये. लेकिन तमाम आदेशों की धज्जियां अब भी सरेआम उड़ाई जा रही है. अस्पताल में पहुचते ही पहले काउंटर पर रकम जमा करना अनिवार्य हो गया है. इसके बिना मरीज को भर्ती ही नहीं किया जा रहा है.

हर सामग्री, जांच की अलग-अलग दरें
मनपा ने निजी कोविड अस्पतालों में 80 फीसदी बेड के लिए शासकीय दर निर्धारित की है. लेकिन अधिकांश लोगों का कहना है कि जब भी अस्पताल में जाने पर मनपा दर के बेड उपलब्ध कराने की मांग की जाये तो पहले से ही मरीज भर्ती होने की बात की जाती है. मनपा के आरक्षित बेड पर भर्ती होने से पहले 1.5 लाख और हास्पिटल के बेड के लिए 2 से ढाई लाख रुपये एडवांस लिये जा रहे हैं. एडवांस दिये बिना मरीजों को भर्ती ही नहीं किया जाता.

जानकारों की माने तो कोविड मरीजों के इलाज के लिए हर उपचार और सामग्री के लिए अलग-अलग दरें तय की गई है. लेकिन इन दरों का कोई हिसाब नहीं है. मरीज की चप्पल से लेकर तो बेड की चादर तक की कीमत जोड़ी जा रही है. हर अस्पताल अपने-अपने स्तर के अनुसार बिल वसूली में लगा हुआ है. यदि नियमों की बात की जाये तो फिर अपने मरीज को सरकारी अस्पताल में भर्ती कराने जैसी भाषा का इस्तेमाल किया जाता है.

शासकीय प्रतिनिधियों की भूमिका पर भी संदेह
प्रशासन ने निजी अस्पतालों में बिलों की निगरानी के लिए शासकीय प्रतिनिधियों की नियुक्ति की है. लेकिन यह प्रतिनिधि कहां बैठते है यह किसी को भी मालूम नहीं. इनसे मिलना भी मुश्किल होता है. जानकार तो यह भी मान रहे है कि उक्त प्रतिनिधि भी अस्पतालों से साठगांठ कर चुप्पी साधे हुये हैं.

अस्पताल द्वारा एक बार जो बिल तय कर लिया गया वह फाइनल हो जाता है. इस हालत में इन शासकीय प्रतिनिधियों की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं. माना जा रहा है कि कुछ निजी अस्पताल करीब दो महीने बंद रखने की कसर अब निकाल रहे हैं. यही वजह है कि मरीजों के परिजन बिल देखकर पसीना-पसीना हो रहे हैं. हालांकि प्रशासन द्वारा बिल संबंधी शिकायत के लिए मोबाइल नंबर दिया गया है. लेकिन इस नंबर पर शिकायत का निवारण नहीं हो रहा है. हर अस्पताल द्वारा पीपीई किट की दरें अलग-अलग लगाई जा रही है. इतना ही नहीं नर्स द्वारा मरीज को जितनी बार जांच की जाती है उतनी बार का बिल लगाया जाता है.