Providing health facilities is the priority of the state government- Chief Minister Uddhav Thackeray

नागपुर. कोरोना महामारी के इस विकराल संकटकाल में बाधितों को इलाज की सुविधा मुहैया कराने के लिए सरकार की ओर से निजी अस्पतालों को भी कोविद अस्पताल के रूप में मंजूरी देकर इलाज के दर भी निर्धारित किए. तमाम प्रयासों के बावजूद मरीजों को इलाज की पर्याप्त सुविधा नहीं मिलने तथा इलाज के अभाव में हुई मृत्यु को लेकर छपी खबरों पर स्वयं संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट द्वारा इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकार किया गया.

याचिका पर सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता एम.जी. भांगडे ने कहा कि चूंकि कोई भी बाधित या निजी अस्पताल की ओर से याचिका दायर नहीं की गई है. अत: यह जनहित की श्रेणी में नहीं आ सकती है. जिस पर न्यायाधीश रवि देशपांडे और न्यायाधीश पुष्पा गनेडीवाला ने सरकार के पास इसका कोई आधार नहीं होने का हवाला देते हुए तर्क को अस्वीकार कर 2 नवंबर तक के लिए सुनवाई स्थगित कर दी. अदालत मित्र के रूप में अधि. श्रीरंग भांडारकर और मनपा की ओर से अधि. जैमीनी कासट ने पैरवी की.

निजी अस्पतालों में सुविधा नहीं मिलना दुखद

सुनवाई के बाद अदालत द्वारा दिए गए आदेश में कहा गया कि स्वयं संज्ञान की इस जनहित याचिका में याचिका किस श्रेणी में आती है. इसे लेकर अदालत फिलहाल सुनवाई नहीं कर रहा है. जबकि समस्या यह है कि निजी अस्पतालों में मरीजों को पूरी तरह से कोरोना की दवा और इलाज मुहैया नहीं हुआ है. फलस्वरूप लोगों को जान तक गंवानी पड़ी है. सरकारी पक्ष की दलिलों को लेकर भविष्य में विस्तार से कारण दर्ज किए जाएंगे.

किंतु हाईकोर्ट द्वारा पूछे जा रहे प्रश्नों पर सरकार की ओर से सीधे जवाब नहीं दिए जा रहे हैं. सरकार की ओर से निजी अस्पतालों में 80 प्रतिशत बेड आरक्षित रखने के लिए 30 अप्रैल और 21 मई को अधिसूचना जारी की थी. इस अधिसूचना की वैधता को लेकर 10 सितंबर और 16 अक्टूबर को हाईकोर्ट की ओर से आदेश जारी किए गए. किंतु इसका जवाब अबतक नहीं दिया गया ह.

तो मरीज के खर्च का कौन उठाएगा बोझ

गत आदेश में अदालत का मानना था कि आपदा प्रबंधन कानून 2005 की धारा 65 का राज्य सरकार की ओर से उपयोग कर यदि निजी अस्पतालों में 80 प्रतिशत बेड आरक्षित किए गए हो, तो ऐसे अस्पतालों के सभी संसाधन, सेवाएं, परिसर और वाहन आदि अस्थायी रूप से प्रदत्त अधिकारी के अधिकार में आते हैं.

एक बार ऐसा करने तथा महामारी कानून 1897 की धारा 2 के तहत नोटिफिकेशन भी जारी किया जाता है, तो राज्य सरकार और संबंधित प्रदत्त अधिकारी पर निजी अस्पतालों में 80 प्रतिशत बेड का प्रबंधन देखने की जिम्मेदारी होती है. साथ ही इस संदर्भ में आनेवाले खर्च का वहन भी उसे ही करना पड़ता है. जिसमें मरीज को निशुल्क इलाज और इलाज के दौरान किस तरह का खर्च उठाया गया. वह भी शामिल होता है. नियम की व्याख्या का दायरा काफी विस्तृत होने से इसके विपरित परिणाम भी है.