Abhijeet Wanjari and Sandeep Joshi

नागपुर. नागपुर संभाग पदवीधर चुनाव में विधान परिषद सीट शुरू से ही भाजपा के कब्जे में रही है. इसे भाजपा की परंपरागत सीट माना जाता रहा और भाजपाई भी इसे अपनी परमानेंट सीट मानकर चलते रहे थे. लेकिन इस बार के पदवीधर चुनाव में भाजपा के इस अभेद्य किले पर कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने महाविकास आघाड़ी के उम्मीदवार के रूप में सेंध लगा दी. खबर लिखे जाने तक मतगणना के 2 चरण पूरे हो चुके थे और दोनों ही चरणों की गिनती में भाजपा के उम्मीदवार नागपुर के मेयर संदीप जोशी वंजारी से पीछे रहे. पहले ही राउंड से जो ट्रेंड रहा वह भी बरकरार रहा तो भाजपा का यह किला ढहना तो तय है.

दरअसल अब तक इस सीट पर कांग्रेस व अन्य पार्टियों ने कभी दम ही नहीं लगाया था. कांग्रेस ने कभी अपने उम्मीदवार ही नहीं उतारे वह मैदान में उतरे किसी समविचारी उम्मीदवार को समर्थन देती रही थी. कांग्रेस की यह उदासीनता भी इसे भाजपा का गढ़ बनाये रखने का कारण रहा. अब जब राज्य में भाजपा को सत्ता से बाहर करने लिए शिवसेना, कांग्रेस व राकां ने मिलकर महाविकास आघाड़ी बनाई तो इस पदवीधर चुनाव में वंजारी के लिए तीनों पार्टी के नेताओं, पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं ने अपनी एकजुटता की ताकत दिखा दी.

देवेन्द्र को लगा दनका

संदीप जोशी पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस के बेहद करीबी मित्र हैं. समझा जा रहा है कि उन्होंने ही गडकरी खेमे के अनिल सोले की टिकट कटवाकर जोशी को उम्मीदवारी दिलाई थी. यह चुनाव भाजपा के साथ ही खासतौर पर फडणवीस के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था. उन्होंने अपनी पूरी ताकत भी प्रचार में झोंकी. खुद केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी जोशी के लिए प्रचार किया लेकिन अब जोशी की हार को देवेन्द्र की हार बताया जा रहा है. चर्चा तो यह भी है कि जोशी को सोले की टिकट काटकर देने के चलते गडकरी गुट में नाराजी थी और गुट ने जोशी के लिए काम नहीं किया. बताते चलें कि देवेन्द्र फडणवीस के पिता गंगाधरराव फडणवीस से लेकर केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी नागपुर पदवीधर सीट से ही चुनाव जीतकर उच्च सदन में पहुंचते थे. गंगाधरराव फडणवीस 2 बार और गडकरी 3 बार इस सीट से विधान परिषद में पहुंचे. उसके बाद अनिल सोले इस सीट से भाजपा के खाते से सदन पहुंचे थे. उनके बाद चुनाव में भाजपा ने नागपुर के मेयर संदीप जोशी को मैदान में उतारा. लग तो यह रहा था कि जोशी भाजपा की इस सीट को भाजपा के कब्जे में बरकरार रखने में सफल होंगे, लेकिन मामला उलटा पड़ गया. 

कांग्रेस बन गई चुनौती

विधानसभा चुनाव में राज्य में भाजपा को सबसे अधिक सीटें मिलीं. शिवसेना के साथ युति थी लेकिन सीएम की कुर्सी को लेकर शिवसेना ने कांग्रेस और राकां के साथ मिलकर महाविकास आघाड़ी सरकार बना ली. उसके बाद से भाजपा और शिवसेना के बीच तलवारें खिंची ही रहती हैं. इस बार जब पदवीधर चुनाव के कार्यक्रम घोषित हुए तो महाविकास आघाड़ी ने भाजपा की परंपरागत सीट पर उसे चुनौती देते हुए कांग्रेस के अभिजीत वंजारी को मैदान में उतार दिया. उनके समर्थन में शिवसेना, राकां सहित कांग्रेस के सारे दिग्गज नेताओं ने एकजुट होकर प्रचार में जोर लगा दिया. हर बार कांग्रेस इस सीट पर गंभीर नहीं होती थी लेकिन वंजारी इसके लिए पिछले 2 वर्षों से मेहनत कर रहे थे. कांग्रेस नेताओं ने भी उनके प्रचार में पूरा जोर लगा दिया. हर बार उदासीन रहने वाली कांग्रेस इस बार भाजपा के लिए चुनौती बन गई और उसे सफलता मिली.

OBC कार्ड जमकर चला

इस चुनाव में ओबीसी कार्ड जमकर चलने की चर्चा है. मेयर जोशी के खिलाफ ओबीसी में गुस्सा उस वक्त से अधिक नजर आ रहा था जब ईमानदार आईएएस अधिकारी मनपा आयुक्त तुकाराम मुंढे को उन्होंने कई तरह से परेशान किया और नागपुर से हटवा दिया. जोशी के खिलाफ उस दौरान सोशल मीडिया में ओबीसी समाज में भारी नाराजगी दिख रही थी. तब कांग्रेस के बंटी शेलके, कमलेश चौधरी मुंढे के समर्थन में उतरे थे. जिले में विकास ठाकरे, बंटी शेलके, सुनील केदार, राजेन्द्र मुलक आदि ने वंजारी के समर्थन में मोर्चा संभाला. वहीं राकां नेता अनिल अहिरकर, सलील देशमुख, शिवसेना सांसद कृपाल तुमाने ने भी कमान संभाली थी जिसका परिणाम वंजारी के समर्थन में नजर आया.