संदेह के घेरे में मनपा के आडिटर

  • निजी अस्पतालों के हितो में कर रहे काम : मनसे

नागपुर. कोरोना के इलाज के लिए मनपा की ओर से निजी अस्पतालों को हरी झंडी दी गई. किंतु इन निजी अस्पतालों द्वारा अनाप-शनाप बिल उगाही किए जाने के लगातार मामले उजागर होते ही सत्यता उजागर करने के लिए मनपा की ओर से अलग-अलग अधिकारियों की बतौर आडिटर टीम नियुक्त की गई. किंतु अब इन आडिटर की कार्यप्रणाली पर ही प्रश्न चिन्ह लग रहा है.

कुछ आडिटर की शिकायत करते हुए मनसे द्वारा अतिरिक्त आयुक्त जलज शर्मा को ज्ञापन सौंपा गया. यहां तक कि समय पर ही इन आडिटर पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो मनसे स्टाईल में आडिटर का आडिट करने की चेतावनी भी दी गई. मनसे प्रदेश महासचिव हेमंत गडकरी, शहर अध्यक्ष विशाल बडगे के मार्गदर्शन में घनश्याम निखाडे, आशीष पांढरे, शशांक गिरडे, सुमित वानखेडे, अन्ना गजभिए, राजेन्द्र पुराणिक, अरविंद सावरकर, अश्विन शेंडे, शंतनू तिजारे, ओंकार चन्ने, प्रज्वल देशमुख आदि शामिल थे.

शिकायत के लिए खोजना पड़ता आडिटर

चर्चा के दौरान शिष्टमंडल ने कहा कि निजी अस्पतालों द्वारा वसूले जा रही अधिक राशी पर अंकुश लगाने के लिए मनपा द्वारा आडिटर तो नियुक्त किए, किंतु दुर्भाग्य से अधिकांश आडिटर सामान्य लोगों की पहुंच से बाहर है. अधिक बीलों की वसूली की शिकायत के लिए इन आडिटर्स को खोजना पड़ता है. किसी तरह इनका मोबाईल नंबर पाने के बाद सम्पर्क किया जाता है. लेकिन आडिटर्स पूरे मामले को सुनने के बाद टालमटोल कर देते हैं. किसी भी तरह मामला कैसे टाला जाए, इसी फिराक में आडिटर्स रहते हैं. ऐसे कई उदहारण देते हुए बताया गया कि एक ओर निजी अस्पताल तो दूसरी ओर आडिटर्स की इस तरह की लापरवाह कार्यप्रणाली के चलते लोगों को मानसिक और आर्थिक त्रास्दी सहनी पड़ रही है. अत: कोविद अस्पतालों में आडिटर्स के मोबाईल नंबर और नाम का फलक लगाने की मांग भी उन्होंने की.

ठंडी पड़ गई है कार्रवाई

एक अन्य मामले को उजागर करते हुए राकां के प्रदेश उपाध्यक्ष वेदप्रकाश आर्य ने आयुक्त का ध्यानाकर्षित किया. जिसमें गुलाबचंद्र झोडापे नामक मरीज से एक नामी निजी अस्पताल द्वारा 5,87,838 रु. का बिल निकाले जाने की जानकारी दी गई. आर्य ने बताया कि इस अस्पताल में आईसीयू में रखने के लिए प्रतिदिन 25000 रु. का शुल्क लगाया गया है. इससे त्रस्द अन्य निजी अस्पताल में शिफ्ट किया गया. किंतु इस बड़े निजी अस्पताल में भी दवा आदि का बिल ही 2.37 लाख रु. निकाला गया. आलम यह है एक तो इन अस्पतालों में मरीजों से मिल नहीं सकते, दूसरी ओर क्या इलाज किया गया, कौनसी दवा दी गई. इसकी जानकारी तक नहीं मिलती है. इन बिल पर ना तो मनपा के आडिटर्स के हस्ताक्षर है और ना ही मनपा के स्टैम्प है.