Professor Saibaba's mother guilty of ties to Maoists dies

  • प्रत्यक्ष सुनवाई की दरकार, HC ने स्थगित किया मामला

नागपुर. नक्सली गतिविधियों के लिए जेल में बंद दिल्ली के प्रोफेसर एवं माओवादी जी.एन. साईबाबा और अन्य की ओर से गुरुवार को फिर एक बार जमानत के लिए हाई कोर्ट में अर्जी दायर की गई. याचिका पर याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रखरता से भले ही अहम दस्तावेज और मुद्दे होने और इन मुद्दों को देखते हुए जमानत मिलने की आशा जताई गई हो, लेकिन सरकारी पक्ष की ओर से बचाव पक्ष की दलीलों को सिरे से खारिज कर जमानत का जमकर विरोध किया गया. दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायाधीश वी.एम. देशपांडे और न्यायाधीश अमित बोरकर ने याचिका के भारी भरकम दस्तावेज और महत्वपूर्ण मामला होने के हवाला देते हुए इसके लिए प्रत्यक्ष सुनवाई की आवश्यकता जताई. अदालत ने वीडियो रिकार्डिंग के माध्यम से इसकी सुनवाई संभव नहीं होने की जानकारी उजागर की. यहां तक कि सरकारी पक्ष की ओर से भी इसका समर्थन किया गया. 

4 सप्ताह तक टाल दिया मामला

याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहीं अधि. नित्या रामकृष्णन ने अदालत से कहा कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से भी हो रही सुनवाई में वह अपना पक्ष रखने के लिए तैयार है. इस तरह की सुनवाई से उन्हें कोई आपत्ति नहीं है. यदि अदालत मामले में प्रत्यक्ष सुनवाई के बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचना चाहती हो तो कोई एतराज नहीं है लेकिन अगली सुनवाई के दौरान जमानत के लिए अपना पक्ष रखने से उन्हें स्वतंत्रता देनी चाहिए. इस पर अदालत का मानना था कि याचिकाकर्ताओं की ओर से जमानत के लिए ही अर्जी दायर की गई है. अदालत इसी अर्जी पर सुनवाई को स्थगित कर रही है जिससे याचिकाकर्ता इसी अर्जी पर अगली सुनवाई के दौरान अपना पक्ष रख सकेगा. अदालत का मानना था कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से हो रही सुनवाई के दौरान यदि सरकारी पक्ष कोई ऐसे दस्तावेज पेश करता हो जो याचिकाकर्ता के पास नहीं हैं और याचिकाकर्ता उससे एतराज जताता है तो ऐसे समय अदालत के लिए भी अड़चन हो सकती है. चूंकि दोनों पक्ष प्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध नहीं है, अत: ऐसे दस्तावेजों की सत्यता परखना भी अड़चन भरा है.

सरकार के पास है वीडियो रिकॉर्डिंग

सरकारी पक्ष की ओर से पैरवी कर रहे विशेष सरकारी वकील प्रशांत सत्यनाथन ने सुनवाई के दौरान कहा कि माओवादी गतिविधियों में याचिकाकर्ताओं के शामिल होने के सरकार के पास न केवल दस्तावेजी सबूत हैं, बल्कि वीडियो रिकॉर्डिंग भी उपलब्ध है. इसे अदालत के समक्ष रखा जा सकता है. अत: याचिकाकर्ताओं को किसी तरह की राहत नहीं देने की मांग उन्होंने की. अदालत का मानना था कि संभवत: कोरोना की इस त्रासदी में 4 सप्ताह के भीतर स्थिति सामान्य होने की आशा की जा सकती है. स्थिति सामान्य होने की सूरत में प्रत्यक्ष सुनवाई भी हो सकेगी जिसके बाद इस याचिका को सुनवाई के लिए रखा जा सकेगा.