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  • हाईकोर्ट का सरकार को झटका, रद्द किए आदेश

नागपुर. कोरोना के संकटकाल में मरीजों को हर हाल में उपचार की सुविधा देने के लिए राज्य सरकार के निर्देशों के अनुसार महानगर पालिका की ओर से न केवल निजी अस्पतालों को कोविद अस्पताल के रूप में मंजूरी प्रदान की. बल्की राज्यपाल के हस्ताक्षरों से निजी अस्पतालों में कोविद और नान-कोविद मरीजों के इलाज के संदर्भ में शुल्क का निर्धारण भी किया.

इस नोटिफिकेशन को चुनौती देते हुए अस्पताल एसोसिएशन एवं अन्य की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई. जिस पर लंबी सुनवाई के बाद न्यायाधीश रवि देशपांडे और न्यायाधीश पुष्पा गनेडीवाला ने नान-कोविद मरीजों के उपचार के लिए शुल्क निर्धारित करने का अधिकार सरकार को नहीं होने का हवाला देते हुए अध्यादेश में शामिल इस मुद्दे को खारिज कर दिया. अदालत मित्र के रूप में वरिष्ठ अधिवक्ता सुबोध धर्माधिकारी, अधि. देवेन चौहान, सरकार की ओर से महाधिवक्ता आशुतोष कुम्भकोनी और मनपा की ओर से अधि. जैमीनी कासट ने पैरवी की.

जनता के हित में सरकार ने लिया फैसला

सुनवाई के दौरान कानूनी पेंच पर सरकार का पक्ष रखते हुए महाधिवक्ता कुम्भकोनी ने कहा कि एक ओर पूरे विश्व में महामारी, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य का मुद्दा राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है. यदि किसी विपदा में विशेष विषय को लेकर कोई अध्यादेश ना हो, तो आर्टिकल 162 के तहत राज्य सरकार को निर्णय लेने का अधिकार होता है. इसी के तहत राज्य सरकार की ओर से जनता के हितों में यह निर्णय लिया गया. उन्होंने कहा कि निजी अस्पतालों में 80 प्रतिशत बेड कोविद मरीज और 20 प्रतिशत बेड गैर कोरोना मरीजों के लिए आरक्षित तो रखे गए, किंतु ऐसे संकटकाल में मरीजों के साथ भेदभाव ना हो, इसके लिए दोनों के लिए शुल्क का निर्धारण किया गया. सरकारी अस्पतालों में बेड नहीं होने से मरीज निजी अस्पतालों में जा रहे थे. उनसे अधिक वसूली ना हो, इसे देखते हुए यह निर्णय लिया गया. 

इंश्योरेन्स कम्पनी से अस्पतालों का समझौता

सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता ने कहा कि मुंबई में फोर्टिस जैसे बड़े अस्पताल द्वारा कोरोना मरीजों के इलाज के लिए इंश्योरेन्स कम्पनी के साथ समझौता किया. इसमें इलाज के भुगतान के जो शुल्क निर्धारित किए गए, वहीं शुल्क राज्य सरकार की ओर से भी तय किए गए. ऐसे में यदि बड़े अस्पताल को इस शुल्क में इलाज कराना संभव है, तो अन्य निजी अस्पतालों को भी संभव होना चाहिए. किंतु शुल्क निर्धारित करने के संदर्भ में कोई भी कानूनी अधिकार नहीं होने तथा डाक्टरों के सेवा के अधिकार का यह उल्लंघन करार देते हुए नान-कोविद शुल्क के आदेश को खारिज कर दिया.