MLA Hostel

नागपुर. एक ओर जहां कोरोना का संक्रमण तेजी से फैल रहा है वहीं दूसरी ओर उपचार के लिए लोगों में अफरा-तफरी का माहौल है. लक्षण दिखाई देने के बाद भी लोग होम आयसोलेशन का आप्शन चुन रहे हैं.लेकिन जब घर में इलाज के दौरान तबीयत गंभीर हो रही है तो निजी अस्पतालों में भर्ती होने के लिए भटकना पड़ रहा है. जबकि प्रशासन द्वारा तैयार किये गये तीन कोविड केयर सेंटर में आधे से ज्यादा बेड खाली पड़े हैं. लोग शासकीय सुविधा का लाभ लेने की बजाय बेवजह परेशान हो रहे हैं.

जब से प्रशासन ने होम आयसोलेशन का विकल्प दिया है. अधिकांश लोग लक्षण कम होने और बिना लक्षण होने की वजह से घर में रहकर ही उपचार को प्राथमिकता दे रहे हैं. अब तक होम आयसोलेशन में रहने वाले 24085 लोग ठीक भी हो चुके हैं. वहीं मंगलवार तक सिटी में जो 11344 एक्टिव केस मिले है, उनमें 5757 लोग होम आयसोलेशन में है. होम आयसोलेशन उन लोगों के लिए ठीक है, जिनके घर में पर्याप्त जगह है. साथ ही उपचार के तमाम साधन और सामग्री है. लेकिन कई लोग अस्पताल में जाने के ‘डर’ से भी होम आयसोलेशन का विकल्प चुन रहे हैं. लेकिन जब तबीयत गंभीर हो रही है तो उन्हें भर्ती करने के लिए निजी अस्पताल तैयार नहीं हो रहे हैं. यह स्थिति सिटी में आम हो गई है.

आधे से ज्यादा बेड खाली
सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग द्वारा विधायक निवास में कोविड केयर सेंटर बनाया गया है. यहां 375 बिस्तरों की व्यवस्था है. वहीं मनपा द्वारा तैयार किये गये वीएनआईटी में 475 से अधिक और पाचपावली कोविड सेंटर में करीब 300 बेड उपलब्ध है. मंगलवार तक विधायक निवास में 150, वीएनआईटी में 60 और पाचपावली में करीब 100 मरीज भर्ती थे. तीनों सेंटर में आक्सिजन सिलेंडर की व्यवस्था है. सुबह और शाम को दो वक्त डाक्टर और नर्स का राउंड होता हैं. इसके अलावा दिनभर खून में आक्सिजन की जांच, तापमान की जांच की जाती हैं.

सुबह-शाम को नाश्ता के अलावा भोजन भी मिलता है. चौबिस घंटे डाक्टर की सुविधा भी उपलब्ध है. स्नान के लिए गरम पानी की भी मिलता है. मरीजों के मनोरंजन के लिए टीवी की भी उपलब्ध कराई गई है. इतना ही नहीं किसी मरीज की तबीयत बिगड़ने पर तुरंत एेबुलेंस की मदद से उसे मेडिकल और मेयो में भी भर्ती किया जाना जा सकता है. सेंटर के मरीजों को मेयो और मेडिकल में भर्ती करने में प्राथमिकता दी जाती हैं. तमाम की तरह की सुविधा होने के बाद भी पाजिटिव मरीज इन केंद्रों में भर्ती होने की बजाय भटक रहे है जो की समझ से परे है.

गंभीर होने पर हो रहे भर्ती
वर्तमान में मरने वाले मरीजों की संख्या कम नहीं हो रही हैं. इसकी मुख्य वजह मरीजों का अस्पतालों में देरी से पहुंचता है. डाक्टरों की माने तो कई लोगों में अब भी तरह-तरह की भ्रांतियां है. शासकीय सुविधा का लाभ लेने की बजाय होम आयसोलेशन में अपने परिजनों को भी संक्रमित कर रहे हैं. जब तबीयत बिगड़ जाती है तब अस्पताल में भर्ती करने का विचार करते हैं. लेकिन तक तक देर हो जाती है. अस्पताल में भर्ती होने के बाद हालत बिगड़ जाने से डाक्टर भी चाह कर कुछ नहीं कर पाते. निजी अस्पतालों ने तो मरीज के गंभीर होने पर सीधे मेडिकल और मेयो में रिफर करना शुरू कर दिया जाता है. परिजनों को बता दिया जाता है कि अब और अधिक खर्च आएगा. खर्च सुनकर परिजनों के भी हाथ-पैर फुलने लगते हैं. मेयो और मेडिकल में भर्ती होने वाले अधिकांश मरीजों में भर्ती होने और मरने के बीच 4-5 दिन का अंतर देखने में मिल रहा है. यही वजह है कि मृत्यु दर को कम करना प्रशासन के लिए अब भी एक चुनौति ही हैं.