Lockdown in Nagpur

    नागपुर. सिटी में भी पिछले वर्ष 18 मार्च को 4 मरीजों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी और हड़कंप मच गया था. देशभर में तब चीन के वुहान से आने वाले भारतीयों में कोरोना होने का भय देखा जा रहा था. हालात को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 19 मार्च 2020 को सभी नागरिकों से 22 मार्च 2020 रविवार को सुबह 7 से रात 9 बजे तक जनता कर्फ्यू की अपील की थी. इसी दिन शाम 5 बजे लोगों ने थाली-घंटी-ताली भी बजाई थी. फिर 24 मार्च को देशभर में 21 दिनों का लॉकडाउन कोरोना की चेन ब्रेक करने के लिए लगा दिया गया था. उसके बाद से तो देश सहित नागपुर सिटी में भी लॉकडाउन का सिलसिला चल निकला.

    अब 22 मार्च 2021 को लॉकडाउन की बरसी है लेकिन तब के और अब को हालातों को देखें तो आज की स्थिति अधिक बदहाल और गंभीर नजर आ रही है. स्थानीय और जिला प्रशासन के साथ ही यहां मंत्री, मनपा की सत्ता में बैठे पदाधिकारी स्थिति को संभालने में बुरी तरह नाकाम रहे हैं. एसी कमरों में बैठकर लॉकडाउन के अनापशनाप नियम बनाकर जनता पर जबरदस्ती थोपने की नीति चल रही है. बंद से होने वाले प्रभावों से राहत देने के लिए कोई नीति नहीं है. बस फरमान सुना दिया और कार्रवाई शुरू कर दी. यही कारण है कि अब सिटी की जनता में रोष देखा जा रहा है.

    तब तो जानकारी नहीं थी

    पिछले वर्ष जब लोगों को कोरोना के संदर्भ में कोई जानकारी नहीं थी. किसी तरह के बचने के उपाय तय नहीं हुए थे. कोई दवा या वैक्सीन भी नहीं थी तब तो लोग डरकर घरों में कैद रहे. इस आशा व उम्मीद के साथ कि हमने प्रशासन, सरकार का साथ दिया तो हमारे हित के लिए व बचाव के लिए ही वह कुछ करेगी. करीब 8-9 महीनों तक कभी बंद तो कभी चालू का खेल चलता रहा. अब तो लोगों को कोरोना के संदर्भ में काफी जानकारियां हैं, वैक्सीन भी आ गई है, लोग अपनी तरफ से सतर्कता का प्रयास भी कर रहे हैं. ऐसे में अब दोबारा सिटी में लॉकडाउन लगाने का फैसला लिया गया है तो वह रास नहीं आ रहा है. लोगों का कहना है कि जब ऐसी रिपोर्ट आ रही थी कि कोरोना की दूसरी लहर आ सकती है तो प्रशासन ने सिटी में अस्पतालों में ऑक्सीजन सहित बेड बढ़ाने के कार्य में उदासीनता क्यों बरती. अब जब संक्रमण दोबारा फैलने लगा है तो अपनी कमी को छिपाने के लिए लॉकडाउन लगाकर लोगों को घरों में कैद करने का काम कर रहे हैं. 

    फ्लाईओवर तक कर बंद दिए 

    पिछले वर्ष तो जब पीएम ने 21 दिनों के संपूर्ण लॉकडाउन की घोषणा की थी तब भी सिटी के फ्लाईओवर को बंद नहीं किया गया था और ठीक एक वर्ष बाद स्थानीय प्रशासन ने सभी फ्लाईओवर बंद कर दिए हैं जिसका कोई मतलब लोगों की समझ में नहीं आ रहा है. जब सिटी में वाहनों की आवाजाही को छूट है तो फिर फ्लाईओवर को बंद रखना समझ से परे है. इतना ही नहीं, बीच में नाइट कर्फ्यू लगाया गया था तब भी सवाल उठा था कि क्या कोरोना दिन में नहीं फैलता. कभी पूरा दिन किराना, दूध, सब्जी-फल, चिकन-मटन की दूकान शुरू रखते हैं और फिर अचानक दोपहर 1 बजे तक सब बंद का फरमान आ जाता है. जब से 1 बजे वाला फरमान आया है, लोगों की भीड़ किराना, राशन, सब्जी दूकानों पर बढ़ गई है.

    टूटता गया भरोसा

    पिछले वर्ष सिटी में लॉकडाउन के दौरान प्रशासन ने विविध संस्थाओं की मदद से लॉकडाउन के चलते जो बेरोजगार हुए थे उनके भोजन की व्यवस्था की थी. मरीजों के उपचार, उन्हें विविध सेंटरों में क्वारंटाइन करने, उपचार के लिए विविध अस्पतालों में बेड उपलब्ध कराने में गंभीरता थी. जहां मरीज मिलते थे उस परिसर को प्रतिबंधात्मक क्षेत्र घोषित कर सील किया जाता था. उसी का परिणाम था कि सिटी से कोरोना के मरीज बेहद कम हो गए थे लेकिन उसके बाद से प्रशासन व जनप्रतिनिधि भी बेपरवाह हो गए. नेताओं द्वारा भीड़ जमा कर आंदोलन तक किया जाने लगा. ऐसे लोगों पर प्रशासन की ओर से कभी कार्रवाई तक नहीं की गई. यह सब जनता देख रही थी और समझ भी रही थी. उस पर प्रतिबंध था, उसके लिए नियम थे और कार्रवाई भी उसके ही लिये थी, नेताओं के लिए नहीं. यही कारण है कि एसी में बैठे अधिकारियों और नेताओं के अनापशनाप निर्णयों के कारण लोगों का भरोसा टूटता गया. 

    दारू ऑनलाइन और दूध पर पाबंदी

    पिछले वर्ष महीनों के लॉकडाउन ने उद्योग, व्यापार, हॉकर्स, टपरी वालों तक को तबाह कर दिया है. लाखों बेरोजगार हो गए. बीते 3 महीनों से जब दोबारा लोगों ने खुद को पटरी पर लाना शुरू किया तो फिर लॉकडाउन थोप दिया गया है. उस पर भी आधे-अधूरे लॉकडाउन में लोगों को दारू तो ऑनलाइन घरपहुंच दी जा रही है और अगर कोई परिवार बच्चों के लिए सुबह के समय दूध खरीदना भूल गया तो दोपहर 1 के बाद उसे दूध तक उपलब्ध नहीं है. पिछले लॉकडाउन से उद्योग, व्यापार, हॉकर्स, टपरी वाले तक तबाह हो गए थे. किसी तरह अब संभलना शुरू हुआ तो फिर उन्हें तबाह करने की तानाशाही चल रही है. यही कारण है कि लोग अब मानने को तैयार नहीं हैं. हजारों रुपये की जुर्माना कार्रवाई के भय से लोग बंद में शामिल तो हो रहे हैं लेकिन उनके मन में यह सवाल है कि पुणे और मुंबई में यहां से अधिक संक्रमित मिलने के बाद भी वहां सबकुछ खुला क्यों रखा गया है? 

    18 को ही बंद हो गई थी सिटी, मुंढे व उपाध्याय ने कर दिया था शटडाउन

    सिटी में गतवर्ष 18 मार्च को ही तेजतर्रार तत्कालीन मनपा आयुक्त तुकाराम मुंढे और तत्कालीन पुलिस कमिश्नर भूषणकुमार उपाध्याय ने शटडाउन कर दिया था. सड़कों पर उतरकर दोनों अधिकारियों ने बाजार, दूकान, फुटपाथ विक्रेताओं से बंद करवाया था. साथ ही 19 मार्च से ही सिटी में कर्फ्यू लगा दिया गया था. सारे बाजार बंद हो गए थे. 22 को जनता कर्फ्यू के पहले दिन 21 मार्च को सिटी में उसका रिहर्सल हुआ था और सिटी की एक-एक जनता ने दोनों अधिकारियों का साथ दिया था. उनकी अपील पर सिटी की सड़कों पर एक व्यक्ति भी नजर नहीं आया. वर्तमान प्रशासनिक अधिकारियों व पदाधिकारियों को यह गंभीरता से सोचना चाहिए कि आज जनता क्यों नहीं सुन रही है? अपील को सुनने वह तैयार क्यों नहीं है? सरकार में बैठे मंत्रियों और मनपा के सत्ताधीशों को भी यह समझने की जरूरत है. लोग तो सोशल मीडिया में कमेन्ट्स मार रहे हैं कि ‘यहां भी चुनाव घोषित कर दो, फिर देखो आज ही लॉकडाउन खत्म हो जाएगा और नेताओं की सभाएं शुरू हो जाएंगी.’