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    नागपुर. ताड़ोबा राष्ट्रीय उद्यान में कर्मचारियों की कमी के चलते प्रबंधन सुचारू नहीं होने से इसे बंद कर दिया गया था. इसे लेकर समाचार पत्रों में छपी खबरों पर हाई कोर्ट की ओर से स्वयं संज्ञान लेकर जनहित में इसे स्वीकार किया गया. लंबे समय बाद बुधवार को याचिका पर सुनवाई हुई. काफी समय होने के बावजूद संरक्षित जंगल के भीतर से अब तक 2 गांवों का स्थानांतरण नहीं होने पर हाई कोर्ट ने सख्त रवैया अपनाते हुए अब अगली सुनवाई तक इसे लेकर विस्तृत हलफनामा देने के आदेश राज्य सरकार को दिए.

    न्यायाधीश सुनील शुक्रे और न्यायाधीश अनिल किल्लोर ने आदेश में कहा कि जनहित याचिका में अदालत मित्र ने कई तरह के मुद्दे उठाए थे. जिसे लेकर संरक्षित जंगलों के संरक्षण की दिशा में उपाय करने थे. इन तमाम मुद्दों पर राज्य सरकार की ओर से अब तक क्या किया गया. इसका जवाब भी देने के आदेश दिए. अदालत मित्र के रूप में वरिष्ठ अधिवक्ता सी.एस. कप्तान ने पैरवी की.

    कानून की पेंच में फंसा है मामला

    बुधवार को सुनवाई के दौरान अदालत मित्र कप्तान ने कहा कि ताड़ोबा अंधारी टाइगर प्रोजेक्ट के अंतर्गत कोलसा, पलसगांव और रानतडोडी जैसे तीन गांवों को दूसरी जगह स्थानांतरित करना था. याचिका लंबित रहते हुए ही संरक्षित क्षेत्र से कोलसा गांववासियों को स्थानांतरित कर दिया गया. यहां तक कि पलसगांव के कई लोग भी उनके लिए निर्धारित दूसरी जगह पर स्थानांतरित होने की सूचना है.

    लेकिन वास्तविक स्थिति केवल राज्य सरकार की ओर से ही उजागर की जा सकती है. अदालत को बताया गया कि वर्ष 1972 और 2006 के कानून में संरक्षित वन और वनों में रहनेवाले आदिवासियों के अधिकारों को लेकर प्रावधान किया गया है. दोनों कानून की पेंच में मसला फंसा हुआ है. किंतु यदि सरकार की इच्छाशक्ति रही, तो बचे लोगों का भी स्थानांतरण किया जा सकता है.

    3 वर्ष पूर्व दायर हुआ था हलफनामा

    बुधवार को सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि याचिका पर 3 वर्ष पूर्व राज्य सरकार की ओर से हलफनामा दायर किया गया था. जिसके बाद सुनवाई के लिए याचिका अदालत के समक्ष रखी तो गई, किंतु सुनवाई स्थगित होते रही है. इस दौरान अब तक क्या हुआ है. इसकी वास्तविकता उजागर होने पर आगे पहल की जा सकती है. जिस पर अदालत ने राज्य सरकार को वास्तविक जानकारी के साथ हलफनामा दायर करने के आदेश दिए.

    उल्लेखनीय है कि अदालत मित्र की ओर से ताड़ोबा अंधारी टाइगर प्रोजेक्ट के अलावा विशेष रूप में विदर्भ के संरक्षित जंगलों और राष्ट्रीय उद्यानों के संरक्षण की दिशा में आवश्यक कदम उठाने के कई मुद्दे जनहित याचिका में शामिल किए थे. अदालत मित्र का मानना था कि इनमें से कुछ पर काम हो पाया, जबकि कुछ मुद्दों पर काम अब तक बचा हुआ है.