Bus Stand, Mor Bhavan

    नागपुर. मोर भवन बस स्टैंड पर फैली अव्यवस्थाओं को दूर करने के लिए अब जनप्रतिनिधियों को ही आगे आना होगा. कागजों में बनी प्लानिंग को धरातल पर लाने की जरूरत है. यात्रियों की सुविधा पर अधिकारियों का बिल्कुल भी ध्यान नहीं है. बस परिवहन से होने वाली कमाई से अधिकारी केवल सरकारी खजाना भर रहे हैं, लेकिन यात्रियों को मूलभूत सुविधा भी उपलब्ध नहीं करा रहे हैं. जनता की हर जरूरतों को पूरा करने का वादा कर सत्ता में आए नेताओं को भी इससे फर्क नहीं पड़ता कि बसों से यात्रा करने वाले यात्रियों को थोड़ी-बहुत सुविधाएं मुहैया करा दें, ताकि उनकी यात्रा मंगलमय हो जाए. अब तो यात्री भी कहने लगे हैं कि बस स्टैंड को देखकर किसी गांव के बस स्टैंड की याद आ जाती है. मोर भवन बस स्टैंड की हालत उसी तरह हो गई है. लोगों का कहना है कि आखिर स्मार्ट सिटी नागपुर का सिटी बस स्टैंड आखिर कब स्मार्ट बस स्टैंड बनेगा. 

    डिजिटल इंडिया के दौर में कुछ भी डिजिटल नहीं

    मोर भवन बस स्टैंड सिटी का मेन बस स्टैंड है. इस बस स्टैंड से जिले के सभी जगहों के लिए बस मिलती है. डिजिटल इंडिया के इस दौर में इस बस स्टैंड पर कुछ भी डिजिटल नजर नहीं आता है. आज भी बसों की जानकारी देने के लिए माइक से एनाउंस किया जाता है. बस स्टैंड पर एक डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड तक नजर नहीं आता है. पूछताछ केंद्र पर भी किसी तरह का बोर्ड मौजूद नहीं है. अगर कोई स्टाफ वहां मौजूद रहा तो यात्रियों को मौखिक रूप से बसों की जानकारी दे देता है. लेकिन अगर कोई नहीं है तो यात्रियों को एक-एक बस के ड्राइवर के पास जाकर जानकारी लेनी पड़ती है. इस चक्कर में कई बार यात्रियों की बसें तक छूट जाती है.

    नेताओं को यात्रियों से मतलब नहीं 

    स्मार्ट सिटी को स्मार्ट बस स्टैंड की सुविधा दिलाने के लिए किसी भी नेता और जनप्रतिनिधियों में खास रूचि नहीं है. यात्रियों की सुविधाओं से नेताओं और अधिकारियों को कोई सरोकार नहीं है. इतनी समस्या होने के बावजूद अब तक किसी नेता या अधिकारी ने मोर भवन बस स्टैंड को संवारने के लिए कदम आगे नहीं बढ़ाए हैं. यात्रियों की सुविधा न ही सही लेकिन कम से कम स्मार्ट सिटी के दर्जे का बस स्टैंड तो बनवा दें ताकि बस स्टैंड देखकर पुराने जमाने के बस स्टैंड की याद न आए. 

    पुरानी योजनाओं पर भी अमल नहीं

    मोर भवन बस स्टैंड को संवारने के लिए पूर्व में कई तरह की योजनाएं बनाई गई थीं जिसमें बड़ी सिटी की तर्ज पर इस बस स्टैंड को बनाने की प्लानिंग भी की गई थी. लेकिन वो सब कुछ ठंडे बस्ते में चला गया. पुरानी योजनाओं पर भी अगर दोबारा अमल कर लें तो बस स्टैंड की सुरत कुछ तो बदली जा सकती है. लेकिन न तो अधिकारियों को इसकी चिंता है और न ही नेताओं को पब्लिक ट्रांसपोर्ट में होने वाली समस्याओं से कोई मतलब है.