सांगवी स्वास्थ्य केंद्र के कर्मी दिन भर रहे गायब

  • आदिवासी क्षेत्र के मरीज हुए हलाकान
  • स्वास्थ्य विभाग की उदासीनता उजागर

धुलिया. सरकार आदिवासी समाज का जीवनस्तर ऊंचा ऊठाने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही है. जिसमें शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा पर सब से अधिक ध्यान दिया जा रहा है पर शिरपुर तहसील के सांगवी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कर्मियों की उदासीनता के कारण शनिवार को दिनभर बंद रहा, जिससे मरीजों को काफी तकलीफ सहनी पड़ी. वहीं स्वास्थ्य अधिकारी का फोन नॉट रिचेबल आ रहा था. जिससे प्रशासन की लापरवाही साफ तौर पर आदिवासी बहुल इलाकों में स्पष्ट हो जाती है.

गर्भवती महिलाओं को किया जाता है शिरपुर रेफर

मुंबई-आगरा राष्ट्रीय राजमार्ग तीन पर बनाए गए सांगवी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से करीब 30-40 गांव जुडे़ हैं. किंतु यहां की स्वास्थ्य सेवा हमेशा ही समस्या और चर्चाओं से घिरी रहती है. जिसको लेकर मरीज और परिजनों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है. यहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र होने के बावजूद सर्दी, खांसी के अलावा कोई खास इलाज नहीं हो पाता. यहां डिलेवरी पेशंट को हमेशा शिरपुर रेफर किया जाता है.  गौरतलब है कि इसी स्वास्थ्य केंद्र की लापरवाही के चलते 4 महीने पहले एंबुलेंस में डीजल ना होने से एक मरीज को जान से हाथ धोना पड़ा था.बीते शनिवार (26 ) को ये स्वास्थ्य केंद्र पूरी तरह से बंद रहा. जहां स्वास्थ्य केंद्र का प्रमुख दरवाजा ही बंद पाया गया. जिससे आने वाले मरीजों को निराश होकर वापस घर लौटना पड़ा. वहीं वैद्यकीय अधिकारी से संपर्क किया गया. किंतु उनसे संपर्क नहीं हो पाया. जिससे स्वास्थ्य कर्मी व वरिष्ठ अधिकारियों की अनदेखी साफ तौर पर स्पष्ट हो जाती है.

हमारा कौन क्या बिगाड़ लेगा?

आदिवासी अंचलों में काम करने वाले अधिकतर अधिकारी और कर्मचारियों में हमारा कौन बिगाड़ लेगा? ये भावना रहती है. और ये कुछ हद तक सही भी है. मरीज मर भी जाता है तो किसी का कुछ भी नहीं होता. यह आदिवासी बहुल इलाकों में शिक्षा की कमी होने के कारण इतिहास बना है. कर्मी किसी से नहीं डरते हैं और मनमानी तरीके से ड्यूटी करते हैं.

स्वास्थ्य कर्मियों की रहती है कमी

शिरपुर तहसील नव संजीवनी योजना और पेसा क्षेत्र में होने के बावजूद स्वास्थ्य अधिकारी से लेकर अन्य कर्मियों की कमी यहां हमेशा से चलती आ रही है. जिस पर किसी भी आदिवासी नेता का ध्यान नहीं है. ज़िला स्वारथ्य अधिकारी की लापरवाही बरतने के कारण यहां के जनप्रतिनिधि भी प्रशासन पर अंकुश लगाने में नाकाम रहे हैं. जिसका विपरीत परिणाम आदिवासी जनता भुगत रही है.