सात समंदर पार पहुंची येवला की पैठणी साड़ी

येवला. पैठणी का महाराष्ट्र की सांस्कृतिक परंपरा में विशेष स्थान है। पैठणी साड़ी (Paithani Saree) का आकर्षण न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी बढ़ रहा है। सौभाग्य की निशानी मानी जाने वाली पैठणी ही येवला की असली पहचान है। येवला पैठणी शब्द विशेष रूप से वास्तविक सोने-चांदी की जरी और कशीदाकारी का नाम है जो बुने हुए कपड़े की साड़ी के साथ जुड़ा हुआ है। 

यहां के पैठणी बुनकरों को राष्ट्रपति पुरस्कार, राज्य पुरस्कार और कुछ अन्य पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। पैठणी व्यवसाय में अधिक रोजगार सृजित करने के लिए, महाराष्ट्र के येवला के पास पैठाणी पार्क की स्थापना की गई है। येवला शहर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में 3,000 से अधिक हथकरघा हैं और बुनकर उन पर अच्छा व्यापार कर रहे हैं

पैठणी (Paithani) के माध्यम से हजारों कारीगरों को रोजगार मिल रहा है। येवला में 300 से अधिक छोटी और बड़ी पैठणी साड़ी की दुकानें हैं। शहर में प्रवेश करने से पहले ही कई दुकानें दिखाई देती हैं। सैकड़ों वर्षों की उथल-पुथल के बाद पैठणी उत्पादन को अब कुछ सहारा मिला है। पैठणी बनाने की कला लगभग दो हजार साल पुरानी है। पैठणी का मूल गांव गोदावरी नदी के तट पर स्थित मराठवाड़ा में स्थापित है। पेशवा द्वारा पैठणी के उत्पादन को प्रोत्साहित और बढ़ावा दिया गया था. माधवराव पेशवा ने येवला में कारीगरों के लिए पैठणी बनाना शुरू किया, उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में पैठणी खूब प्रसिद्ध हो गई।

पैठणी की कीमत तीन हजार से तीन लाख से अधिक हो सकती है। उच्च कीमत की पैठणी में असली रेशम का उपयोग किया जाता है। इस महावस्त्र की मार्केटिंग महाराष्ट्र में अच्छी तरह से होने के कारण, पैठणी के लिए सुनहरे दिन आ गए हैं। पैठणी साड़ी अब देश में अधिक प्रचालित है। महिलाओं के समारोह में पैठणी का होना जरूरी होता जा रहा है। सोने के धागों की कीमत बढ़ती जा रही है। अब पैठाणी साड़ियों के साथ न केवल जैकेट, मोर कढ़ाई वाले पर्स बल्कि पैठणी टाई भी उपलब्ध हैं। इस कारण अधिक वेरायटी होने से पैठणी की मांग विदेशों में भी बढ़ती जा रही है। उन बुनकरों के हाथों को सलाम जो इन कपड़ों को बुनते हैं और उनमें सुंदरता डालते हैं।