लोगों के लिए बड़ी बला VVIP का काफिला जनता-नेता का फासला

    पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, जब किसी मुगल बादशाह या सुल्तान का काफिला निकलता था तो सारी सड़कें सुनसान हो जाती थीं और लोग अपने घरों में चूहों की तरह दुबक जाते थे. रास्ते में कोई अपंग या बूढ़ा नहीं हट पाया तो उसे बादशाह के हाथी के पैर या घोड़ों की टाप से कुचल डाला जाता था. जैसे ही घोषणा होती थी कि शहंशाह का काफिला आ रहा है, बाजार में भगदड़ मच जाती थी.’’ हमने कहा, ‘‘आज भी कुछ नहीं बदला है. वीवीआईपी की नजरों में आम जनता गाजर-मूली है. सुरक्षा के नाम पर आतंक पैदा किया जाता है.

    रोड टैक्स देने वाला आम नागरिक उस सड़क पर जाने से रोक दिया जाता है जहां से वीवीआईपी का कारवां गुजरने वाला है. कोई बीमार अस्पताल जानेवाला हो, किसी को परीक्षा हाल में या इंटरव्यू देने जाना हो, किसी को ट्रेन पकड़नी हो तो भी उसकी कोई सुनवाई नहीं है. इसके बावजूद हम इसे जनता का राज या लोकतंत्र कहते हैं! इस तरह के अवरोध की वजह से किसी की मौत हो गई तो वीवीआईपी के सचिव तुरंत उसके परिजन को संवेदना पत्र भेजकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं.’’ पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, स्विटजरलैंड में आम लोगों के साथ वहां का राष्ट्रपति भी कतार या क्यू में खड़ा होकर अपनी बारी का इंतजार करता है. स्वीडन, डेनमार्क, नार्वे और फिनलैंड जैसे स्कैडिनेवियाई देशों में वहां के नेता आम जनता के साथ सार्वजनिक वाहनों जैसे कि ट्रेन या बस में सफर करते हैं.

    अमेरिका में राजनेताओं के लिए सड़क पर घंटों ट्रैफिक नहीं रोका जाता जैसे कि हमारे यहां होता है. न्यूजीलैंड में तो वहां के प्रधानमंत्री का काफिला स्पीड लिमिट का उल्लंघन करने के लिए रोका गया और उस पर जुर्माना किया गया. अपने यहां तो हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के विधायक भी अपनी गाड़ियों के बोनट पर झंडी लगाए रखते हैं ताकि उन्हें रोकने की किसी की हिम्मत न पड़े. हमारे देश में मंत्री, सांसद, विधायक व अन्य वीआईपी को अत्यंत उच्च वर्ग का दर्जा प्राप्त है. वे लोकतंत्र के बादशाह या डेमोक्रेसी के ड्यूक हैं!’’