लॉकडाउन में विश्वासघात, बुजुर्गों पर हुआ आघात नई पीढ़ी की करामात

    पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, कितने खेद की बात है कि लॉकडाउन के दौरन 73 प्रतिशत बुजुर्गों को अपने परिवार में दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा. उनके साथ शारीरिक या मानसिक तौर पर हिंसक बर्ताव हुआ. सम्मान देने की बजाय उपेक्षा की गई. प्रेम-स्नेह की बजाय रूखा व्यवहार किया गया.’’ हमने कहा, ‘‘बुजुर्गों से घर की शान और प्रतिष्ठा रहती है. वे लोग भाग्यवान हैं जिन्हें अपने बूढ़े माता-पिता या दादा-दादी की छत्रछाया उपलब्ध है. भारतीयों के लिए गर्व की बात है कि यहां संयुक्त परिवार रूपी संस्था रही है.

    विदेश में परिवार का मतलब होता है वाइफ, हस्बैंड और किड्स! वहां बुजुर्ग माता-पिता अलग रहते हैं और कभी-कभार अपॉइंटमेंट लेकर बेटे-बहू व नाती-पोतों से मिलने चले आते हैं. साथ में लंच या डिनर लेते हैं और फिर गिफ्ट देकर कुछ घंटों में वापस लौट जाते हैं. ये बुजुर्ग भी बेटे-बहू के यहां नहीं, बल्कि उनके शहर के किसी होटल में ठहरते हैं.’’ पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, भारत भी धीरे-धीरे उसी राह पर जा रहा है. कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में संयुक्त परिवार हुआ करता था लेकिन अब ऐसी बात नहीं रही. औद्योगिक क्रांति के बाद से दंपति शहर के छोटे मकानों में किराए से रहते हैं. वे अपने बाल-बच्चों की फिक्र करें या बुजुर्गों को संभालें!’’ हमने कहा, ‘‘बुजुर्गों को भी परिस्थितियों के अनुसार एडजस्ट करना सीखना चाहिए.

    उन्हें अपमान या उपेक्षा से बचना है तो अपने लिए कुछ व्यक्तिगत जमा पूंजी बचाकर रखनी चाहिए ताकि बुढ़ापे में स्वाभिमान से जी सकें और बेटे-बहू के सामने हाथ फैलाने की नौबत न आए. दूसरी बात यह कि शहरी जीवन गतिशील है जहां गांव जैसे चोंचले नहीं चलते कि कोई बार-बार चाय-नश्ता लाकर दे और रसोई में दिन भर मनपसंद चीजें बनती रहें. कामकाजी लोगों के पास बातचीत के लिए भी ज्यादा समय नहीं होता. बुजुर्गों में भी इतनी समझ होनी चाहिए कि ज्यादा रोकटोक न करें व किसी की प्राइवेसी में दखल न दें. उन्हें ओवर एक्सपेक्टेशन न रखते हुए शांति से रहना चाहिए. जो बुजुर्ग परिवार से ज्यादा उम्मीदें रखता है, वही दुख पाता है.’’