किसी जमाने में था जलवा, बंगाल में कांग्रेस बनी वोटकटवा

    पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, (Nishanebaaz) छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल (Bhupesh Baghel) ने मान लिया है कि बंगाल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए ज्यादा संभावनाएं नहीं हैं.’’ हमने कहा, ‘‘कम-ज्यादा की बात छोड़िए, वहां कांग्रेस का कोई स्कोप ही नहीं है. बंगाल में मुख्य मुकाबला (Bengal Assembly Elections) टीएमसी और बीजेपी के बीच है. यह समझकर ही राहुल गांधी ने वहां अपनी रैलियां रद्द कर दी हैं.

    बंगाल की जनता कांग्रेस से कहती है- ये गलियां ये चौबारा, यहां आना ना दोबारा कि तेरा यहां कोई नहीं! वहां का मतदाता कांग्रेस से पूछता है- मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है?’’ पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, हमें वह समय याद आता है जब आजादी के बाद डा. विधानचंद्र राय बंगाल के कद्दावर कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे. कांग्रेस के प्रफुल्ल चंद्र घोष और अजय कुमार मुखर्जी भी वहां सीएम रहे. सिद्धार्थ शंकर रे बंगाल के आखिरी कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे. बाद में लेफ्ट पार्टियां सत्ता में आ गईं और सीपीएम नेता ज्योति बसु 3 दशक तक बंगाल के सीएम रहे. लेफ्ट को कड़ी टक्कर देकर टीएमसी की कर्ताधर्ता ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं.

    अब देखना होगा कि 2 मई को आनेवाले चुनावी नतीजे राज्य में कौन सा गुल खिलाते हैं!’’ हमने कहा, ‘‘गुल-गुलशन-गुलफाम की बात छोड़िए, कांग्रेस की दुर्दशा को देखिए जिसका बंगाल में अपना कोई दमखम नहीं है. वह सिर्फ वोटकटवा पार्टी बनकर रह गई है. वह ममता के वोटों में सेंध लगा सकती है. सेक्युलरिज्म के नाम पर अल्पसंख्यकों के वोट काटेगी. अपना खेल तो जमा नहीं सकती, दूसरे का खेल बिगाड़ेगी. कुछ लोग ऐसी प्रवृत्ति के रहते हैं कि अपनी नाक कटाकर दूसरे का अपशकुन करते हैं. कांग्रेस और लेफ्ट संयुक्त मोर्चा बनाकर चुनाव मैदान में है जरूर, लेकिन उनकी हालत ‘नाच न जाने, आंगन टेढ़ा’ जैसी है.’’