वायरस को जीने का अधिकार त्रिवेंद्रसिंह रावत का अनोखा विचार

    पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्रसिंह रावत ने पिछले दिनों एक अदभुत व अनूठा विचार प्रस्तुत करते हुए कहा था कि वायरस भी एक जीव है जिसे जीने का अधिकार है. उनके इस दृष्टिकोण के बारे में आपकी क्या राय है?’’ हमने कहा, ‘‘यह वसुधैव कुटुम्बकम वाला उदार चिंतन है. बहुत पहुंचे हुए संत या दार्शनिक इस तरह की सोच रखते हैं. इसमें जियो और जीने दो का संदेश है. रावत ने समूची जीव सृष्टि से प्रेम जताया है. वायरस को चाहिए कि उन्हें थैंक यू कहे. वे वायरस के नष्ट होने की नहीं, बल्कि उसके जीवित और सकुशल रहने की कामना कर रहे हैं.

    त्रिवेंद्रसिंह की शुभकामना है- लांग लिव वायरस!’’ पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, जिस खतरनाक वायरस ने विश्व में लाखों लोगों की जान ली, उसे जीने का अधिकार कैसे दिया जा सकता है? उसका समूल नाश या उच्चाटन होना ही चाहिए.’’ हमने कहा, ‘‘मेनका गांधी तो सिर्फ पशु-पक्षियों के प्रति सहृदयता जताती थीं और उनके साथ क्रूरता का विरोध करती थीं लेकिन त्रिवेंद्रसिंह रावत उनसे भी चार कदम आगे निकले. वे कोरोना वायरस के जीने के अधिकार की वकालत कर रहे हैं. संविधान में इंसानों को दिए गए ‘राइट टु लिव’ को घातक कोरोना वायरस के लिए भी लागू कर रहे हैं.’’

    पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, शायद रावत ने कहीं पढ़ा होगा कि मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है. उन्होंने सुनील दत्त के डाकू के रोल वाली पुरानी फिल्म ‘मुझे जीने दो’ देखी होगी. महात्मा गांधी की अहिंसा का प्रभाव उनके मन पर पड़ा होगा, इसीलिए उन्होंने वायरस के प्रति अपनापन दिखाते हुए कहा कि वायरस को भी जीने का अधिकार है.’’ हमने कहा, ‘‘जब मन में इतना प्रेम उमड़ने लगता है तो लोग गाने लगते हैं- किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार, किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार, किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार, जीना इसी का नाम है.’’