nishane-baaj

पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के अधिकार को लेकर एक बड़ा फैसला दिया है कि बेटियों का अपने पिता की पैतृक संपत्ति पर बराबरी का हक है. यहां तक ठीक है लेकिन बेटों के व्यवहार पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने जो टिप्पणी की है, उसका क्या औचित्य है? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बेटियां हमेशा बेटियां रहती हैं जबकि बेटे तो बस विवाह तक ही बेटे रहते हैं. मतलब यह कि शादी के बाद बेटे बदल जाते हैं.’’

हमने कहा, ‘‘अपने जजमेंट के साथ जज टिप्पणियां भी करते हैं. यह टिप्पणी उनके नजरिए या अनुभव पर भी आधारित हो सकती है. अपना-अपना ऑब्जर्वेशन है. यह टिप्पणी तो ऐसा संकेत देती है कि बेटा शादी के बाद माता-पिता को नहीं पूछता. उसका स्वभाव व व्यवहार बदल जाता है और वह जोरू का गुलाम बनकर रह जाता है.’’ पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, हमें तो नहीं लगता कि बेटे ऐसे होते होंगे. यह देश पिता के वचन को निभाकर 14 वर्ष वनवास जाने वाले राम का है.

यहां श्रवण कुमार जैसा आज्ञाकारी बेटा हुआ है जो अपने बूढ़े माता-पिता को कांवड़ में बिठाकर तीर्थयात्रा पर ले गया था. कितने ही संस्कारी बेटे अपने माता-पिता की जरूरतों का पूरा ध्यान रखते हैं. शादी के बाद बेटा बदलता नहीं है, बल्कि वह अपनी जीवनसंगिनी के प्रति भी अपना दायित्व निभाता है.

यदि पति अपनी पत्नी का ख्याल नहीं रखेगा तो और कौन रखेगा? कोई व्यक्ति अच्छा पति होने के साथ अपने माता-पिता का अच्छा बेटा भी तो रह सकता है. कितने ही संयुक्त परिवारों में इस तरह का संतुलन बना हुआ है. माता-पिता को भी सोचना चाहिए कि शादी के बाद उनके बेटे की जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं. वह पहले के समान पूरी तनख्वाह लाकर उनके हाथों में नहीं रख सकता.

यदि वह उनकी आवश्यकताओं की पूरी फिक्र करता और कुछ समय निकालकर उनसे प्रेम से बात कर लेता है तो इतना ही काफी है. इससे ज्यादा की उम्मीद क्यों करनी चाहिए! शादी के बाद बेटे का भी तो अपना संसार है. वह कोई बच्चा तो नहीं रहा. घर में जो बहू आती है, उसके सारे नए रिश्ते पति की वजह से ही तो बनते हैं. समझदार सास-ससुर अनुशासन कायम रखते हुए बहू को बेटी के समान ही मानते हैं, तभी घर में सुख-शांति बनी रहती है. जो लोग बेटे-बहू के सुख में खलल डालते हैं या उन्हें स्पेस नहीं देते, वे खुद अपनी दुर्गति कराते हैं. बेटियां निश्चित रूप से हमेशा बेटियां रहती हैं, उन्हें अपने मायके से बहुत लगाव होता है परंतु बेटा भी उतना ही प्यारा होता है. बहुत कुछ परवरिश और संस्कारों पर निर्भर करता है. संतानों के बीच भेदभाव अपेक्षित नहीं है.