जय जवान जय किसान, पानी की तेज धार व आंसू गैस से सम्मान

पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज (Nishanebaaz), किसान बनने का हमारा अरमान पूरा नहीं हो पाया। यदि हम किसान बनते तो हमें कितना महत्व मिलता। पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री (Lal Bahadur Shastri) ने किसान को सम्मान देते हुए ‘जय जवान जय किसान’ (Jai jawan jai kisan) का नारा दिया था। इसी नारे में पूर्व पीएम अटलबिहारी वाजपेयी ने ‘जय विज्ञान’ का पुछल्ला जोड़ दिया। ऐसे बढ़िया नारों से हिंदुस्तान का आसमान गूंजना चाहिए ताकि अन्नदाता किसानों (Farmers’ protest) को प्रोत्साहन मिले।’’ हमने कहा, ‘‘आप भारी गलतफहमी में हैं।

आप किसान बनेंगे तो आप आंदोलन करते हुए न्याय मांगने के लिए दिल्ली जाएंगे। रास्ते में आपका स्वागत ठंडे मौसम में ठंडे पानी की तेज मोटी धार से किया जाएगा जो पत्थर जैसी लगती हैं। वैसे भी आप फसलों के नुकसान, उचित दाम न मिलने से रोते हैं। लेकिन इतना काफी नहीं है, आपको अच्छी तरह रुलाने के लिए आप पर आंसू गैस छोड़ी जाएगी।’’ पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, सच्चा किसान कभी चुनौतियों से नहीं डरता। प्राचीन काल में जब-जब विदेशी हमला हुआ, किसानों ने अपनी दराती या हंसिया को पिघलाकर तलवार बनाई थी। किसान की वजह से ही मेरा भारत महान है।’’ हमने कहा, ‘‘दुश्मन से निपटना आसान है, अपनों से कैसे निपटेंगे? इंसान व्यर्थ की बदनामी और दुष्प्रचार की मार से बहुत डरता है।

जो कोई भी लोकतांत्रिक आदर्शों में विश्वास करते हुए सरकार की नीतियों, फैसलों या कदमों का विरोध करता है, उसके माथे पर यह सरकार बदनामी का काला टीका लगा देती है। आपके आंदोलन को खालिस्तानियों व कांग्रेसियों की कारगुजारी और राष्ट्रविरोधी बताया जाएगा। पंजाब के सिख किसानों पर ऐसा लेबल लगा देना काफी आसान है। आपको हर बार पीएम के मन की बात सुननी पड़ेगी लेकिन आपके मन की बात पीएम कभी नहीं सुनेंगे। उन्हें इसकी जरूरत भी नहीं है। किसानों का दिल सरकार के बिल को स्वीकार नहीं करता, जिन्हें बगैर किसी बहस के सरकार ने जल्दबाजी में ध्वनिमत से पास करा लिया और विचार के लिए चयन समिति को भेजने की जरूरत ही नहीं समझी। सरकार जो करे सो कायदा!’’ पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, सरकार अपने मंत्रियों से सशर्त चर्चा करने के लिए कह तो रही है। किसान नेता मान क्यों नहीं जाते?’’ हमने कहा, ‘‘जिन मंत्रियों की अपने राज्य का मुख्यमंत्री बनने की भी हैसियत नहीं है, उनके साथ चर्चा का फायदा ही क्या? उनमें फैसला लेने का कौन सा पावर है? उनके वादे पर कौन ऐतबार करेगा? वे लिखकर तो कुछ देने वाले नहीं। सारे अधिकार सिर्फ पीएम के पास हैं जिन्हें असहमति या विरोध बिल्कुल बर्दाश्त नहीं है।’’