नेता दिलाते हैं विश्वास वादा न निभाया तो लूंगा संन्यास

    पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष के नेता देवेंद्र फड़णवीस ने बयान दिया है कि मुझे सत्ता दो, मैं 3 महीने में ओबीसी को आरक्षण दूंगा, नहीं तो मैं हमेशा के लिए राजनीति से संन्यास ले लूंगा. इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?’’ हमने कहा, ‘‘संन्यास लेने का प्रावधान भारतीय संस्कृति में है. 50 से 75 वर्ष की उम्र तक वानप्रस्थ और 75 वर्ष की उम्र के बाद संन्यास! संन्यासी संसार का मोह छोड़ देता है, भगवान में मन लगाता है और भिक्षा में जो भी मिल जाए, खाकर संतुष्ट रहता है. पहले संन्यास लेने के बाद लोग वन में रहने चले जाते थे और वहां आश्रम या कुटिया बनाकर रहते थे.

    आजकल जंगल सरकारी हो गए हैं, वहां जाकर कोई भी नहीं बस सकता. संन्यासी चाहे तो गेरुआ वस्त्र पहनकर किसी मठ में रह सकते हैं. मनोज कुमार की ‘संन्यासी’ नामक फिल्म आई थी जिसमें हीरोइन गाती है- चल संन्यासी मंदिर में, तेरा चिमटा मेरी चूड़ियां साथ-साथ खनकाएंगे.’’ पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, हम उस तरह के संन्यास की बात नहीं कर रहे हैं. कितने ही क्रिकेट, फुटबाल व हॉकी खिलाड़ी 35-40 वर्ष की उम्र में खेल से संन्यास ले लेते हैं. जब खिलाड़ी संन्यास लेता है तो कहा जाता है- ‘ही हैंग्ड हिज बूट्स’ मतलब उसने अपने जूते खूंटी पर टांग दिए.’’ हमने कहा, ‘‘राजनीति का जिस पर रंग चढ़ जाता है, वह स्वेच्छा से संन्यास लेता नहीं, उसे संन्यास पर भेज दिया जाता है.

    बीजेपी के संन्यास आश्रम का नाम है- परामर्शदाता मंडल. इसमें बुजुर्ग नेता लालकृष्ण आडवाणी और डॉ. मुरलीमनोहर जोशी को स्थान दिया गया है. वे परामर्श देने को तैयार हैं, मगर उनसे कभी कोई राय नहीं लेता. फिर भी कुछ नेताओं के मन में संन्यास की भावना विद्यमान रहती है. प्रधानमंत्री मोदी ने भी एक अवसर पर कहा था कि हम तो फकीर आदमी ठहरे, कभी भी झोला-डंडा उठाकर चल देंगे. जहां तक देवेंद्र फडणवीस की बात है, राजस्व मंत्री बाला थोरात ने फडणवीस को उनका वह वादा याद दिलाया है जिसमें उन्होंने कहा था कि जब तक स्वतंत्र विदर्भ की स्थापना नहीं हो जाती, वे शादी नहीं करेंगे.’’