nishanebaaz-Farmer leaders threaten, do not want to eat salt of government

पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, किसान नेता सरकार का नमक नहीं खाना चाहते.

पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, किसान नेता सरकार का नमक नहीं खाना चाहते. केंद्र सरकार ने उन्हे नाश्ता और भोजन देना चाहा लेकिन उन्होंने इसे लेने से साफ इनकार कर दिया. उन्होंने गुरुद्वारे के लंगर से प्रसाद (भोजन) मंगा कर खाया. आखिर वे ऐसा क्यों कर रहे हैं?’’ हमने कहा, ‘‘किसी का नमक खाने से इंसान उसका नमकहलाल हो जाता है और उसकी बात माननी पड़ती है. किसान सरकार से दबना नहीं चाहते इसलिए उसकी दावत उन्हें कबूल नहीं है.’’ पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज नमक या तो टाटा का होता है या पतंजलि का. एक गाय छाप सस्ता नमक भी होता है. जब सरकार नमक बनाती ही नहीं तो किसान नेता इतना परहेज क्यों कर रहे हैं? आखिर राजनीति में नमक कहां से आ गया?’’ हमने कहा, ‘‘राजनीति में नमक शुरू से रहा है. याद कीजिए, महात्मा गांधी ने अंग्रेज शासकों के खिलाफ नमक सत्याग्रह किया था. उन्होंने दांडी मार्च निकाला था और समुद्र के किनारे एक मुट्ठी नमक को उठाकर अंग्रेजों के नमक पर टैक्स लगाने के काले कानून का विरोध किया था. नमक कानून तोड़ने पर बापू को गिरफ्तार किया गया था. नमक साहित्य में भी है. मुंशी प्रेमचंद ने ‘नमक का दरोगा’ नामक कहानी लिखी थी.’’ पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, ग्रीक और रोमन साम्राज्य में सैनिकों को वेतन नमक या साल्ट के रूप में दिया जाता था. इसी से तनख्वाह के लिए सैलेरी शब्द बना. नमकहराम और नमकहलाल नामक 2 अलग-अलग फिल्मे बनी हैं और दोनों में अमिताभ बच्चन ने अभिनय किया है. फिल्म ‘शोले’ में कालिया कहता है- सरदार, मैंने आपका नमक खाया है. इसके जवाब में गब्बरसिंह कहता है- तो अब गोली खा. इसी फिल्म में धर्मेन्द्र गाता है- कोई हसीना जब रूठ जाती है तो और नमकीन हो जाती है. जब किसी को डिहाइड्रेशन हो जाता है तो उसे नमक-शक्कर व नींबू पानी में घोलकर पिलाया जाता है. अब असली बात यह है कि किसान सरकार का नमक क्यों नहीं खा रहे हैं?’’ हमने कहा, ‘‘हर किसी का दिया हुआ खाना नहीं खाना चाहिए. जब दुर्योधन ने पांडवों के दूत के रूप में आए श्रीकृष्ण को अपने यहां भोजन करने को कहा तो उन्होंने इनकार करते हुए कहा कि जहां बहुत भूख लगी हो या कोई प्रेम से भोजन कराए तो करना चाहिए. न तो मैं भूखा हूं, न तुम्हारे मन में मेरे प्रति कोई प्रेम है इसलिए तुम्हारा भोजन मुझे स्वीकार नहीं है. इसके बाद श्रीकृष्ण ने विदुर के घर जाकर भोजन किया था. प्रेम के भूखे रामने शबरी के बेर और सुदामा के चावल खा लिए थे. जहां प्रेम नहीं है, वहां खाने का सवाल ही नहीं उठता.’’