देवभाषा में आंखों देखा हाल अब संस्कृत में भी क्रिकेट कमेंट्री

पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, (Nishanebaaz) आपको जानकर आश्चर्य होगा कि भोपाल(Bhopal) में एक क्रिकेट (Cricket) मैच ऐसा हुआ जिसका आंखों देखा हाल संस्कृत में सुनाया (Sanskrit Version) गया. यूं तो संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है लेकिन फिर भी जिस जमाने में लोग संस्कृत में वार्तालाप करते थे तब क्रिकेट का खेल कहां था? इसलिए सोचना पड़ता है कि इस खेल की संस्कृत में कमेंट्री कैसे की गई होगी?’’ हमने कहा, ‘‘क्रिकेट के लिए गेंद जरूरी है और गेंद को संस्कृत में कंदुक कहते हैं.

तुलसी रामायण में परशुराम से तीखा संवाद करते हुए लक्ष्मण ने कहां था- कंदुक सम ब्रह्मांड उठाऊं. उन्होंने गेंद के समान पृथ्वी को उठाने की बात कही थी. वैसे भी शेषावतार लक्ष्मण के लिए कुछ भी असंभव नहीं था.’’ पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, हम मानते हैं कि गेंद प्राचीन काल से मौजूद थी लेकिन बैट कहां रही होगी? संभव है कि कोई चपटा डंडा किसी को मिल गया होगा.’’ हमने कहा, ‘‘चपटी लकड़ी को पट्टा कहते हैं. इसलिए गेंद और बैट के इस खेल को भोपाल में ‘पटकंदुक क्रीड़ा’ नाम दिया गया. महर्षि महेश योगी की 104वीं जयंती पर यह क्रिकेट मैच खेला गया. इसे खेलनेवाले धोती पहने हुए थे. ये खिलाड़ी ज्यादातर पुजारी या संस्कृत के छात्र थे. इस मैच के आयोजकों के सामने चुनौती थी कि क्रिकेट के लिए संस्कृत शब्दावली कैसे इस्तेमाल की जाए. उन्होंने प्रयास के बाद इसमें सफलता पाई.

अम्पायर को निर्णायक का नाम दिया गया.’’ पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज तब तो इस मैच में चौके को चतुर्थम और छक्के को षष्ठम कहा गया होगा. फील्डिंग में पाइंट की पोजीशन को बिंदु, कवर को आवरण तथा मिडविकेट को मध्य दंडिका कहा गया होगा. लांगआन को लंबवत केंद्र बताया गया होगा. थर्ड मैन को तृतीय पुरुष कहा गया होगा. स्पिन बोलिंग को चक्राकृति कंदुक कौशलम का नाम दिया गया होगा.’’ हमने कहा, ‘‘यह सब हमें नहीं पता. आप इस तरह अटकलें लगाने की बजाय किसी संस्कृत विशेषज्ञ से पूछिए. वह आपको पूरी शब्दावलि समझा देगा. अंग्रेजी, हिंदी मराठी में आपने हमेशा क्रिकेट कमेंट्री सुनी होगी अब देवभाषा संस्कृत में भी प्रत्यक्ष दर्शनं वृतांत सुनने को तैयार हो जाइए.’’