लगती है हैरत की बात संघ ने दिया था राजीव का साथ

    पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, हाल ही में प्रकाशित किताब ‘हाउस ऑफ सिंधियाज’ में दावा किया गया है कि 1984 के लोकसभा चुनाव में आरएसएस ने राजीव गांधी की मदद की थी और बीजेपी को बेसहारा छोड़ दिया था. चुनाव से पहले तत्कालीन संघ प्रमुख बालासाहब देवरस के छोटे भाई भाऊराव देवरस कम से कम 6 बार राजीव गांधी से मिले थे. किताब में यह भी दावा किया गया है कि बालासाहब देवरस की राजीव के साथ गोपनीय मीटिंग हुई थी.’’ हमने कहा, ‘‘इन बातों की पुष्टि या खंडन करने के लिए राजीव गांधी या देवरस बंधु जीवित नहीं हैं.

    इसलिए किताब पढ़कर दिल बहलाने के अलावा कोई चारा नहीं है. संघ के नेताओं को राजीव गांधी से मिलने की क्या वजह रही होगी? कांग्रेस और आरएसएस में तो छत्तीस का आंकड़ा रहा है!’’ पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, 1985 में अयोध्या में राम जन्मभूमि का ताला खुल गया था और विवादित स्थल पर रामलला की मूर्ति रखवा दी गई थी, इसलिए समझ जाइए कि तब संघ नेताओं और राजीव के बीच कुछ खिचड़ी पकी होगी. वैसे संघ कुछ भी कर सकता है. वह हिंदूवादी विचारों का पावर हाउस है.’’ हमने कहा, ‘‘संघ ने बीजेपी को 1984 के चुनाव में अधर में छोड़ दिया था, यह बात हमें विश्वसनीय नहीं लगती.’’ पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, आरएसएस ने साथ नहीं दिया, तभी तो बीजेपी उस चुनाव में सिर्फ 2 सीटों पर सिमट गई थी. अटलबिहारी वाजपेयी भी चुनाव हार गए थे. आरएसएस जानता था कि इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति लहर में कांग्रेस प्रचंड बहुमत से जीतेगी, इसलिए उसने बीजेपी को रामभरोसे छोड़ दिया था.

    संघ बीजेपी सहित अनेक संगठनों का अभिभावक है. उसके अधीन शिक्षा भारती, उद्योग भारती, भामसं,  वनवासी कल्याण आश्रम, अभाविप, विहिप, बजरंग दल, दुर्गावाहिनी जैसे विविध संगठन आते हैं. संघ का बीजेपी पर पूरा कंट्रोल है. बीजेपी का बड़ा से बड़ा नेता भी सरसंघचालक को पूरा सम्मान देता है. 1951 में जब जनसंघ बना था तो उस पर भी आरएसएस का कड़ा नियंत्रण था. उसने अपने निर्देशों से बाहर जाने वाले जनसंघ के अध्यक्ष आचार्य रघुवीर और मौलिचंद्र शर्मा को बाहर का रास्ता दिखा दिया था. जिन्ना की तारीफ करने वाले आडवाणी भी आरएसएस के इशारे पर किनारे लगा दिए गए.’’