किचन में किचकिच की शुरुआत, सब्जियां दिखाती औकात, घरेलू बजट पर आघात

    पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, सब्जियां अचानक महंगी हो गईं जिससे किचन का बजट बिगड़ गया. फूलगोभी, परवल, भिंडी, टिंडा 80 रुपए किलो के भाव से बिकने लगे.’’ हमने कहा, ‘‘सब्जियों के भाव में क्या रखा है, अपने भावनाप्रधान मन में उमड़ते भावों को देखिए. जब नेता तरह-तरह के सब्जबाग मुफ्त में दिखाते हैं तो सब्जियों के दाम को लेकर इतनी फिक्र करने की क्या जरूरत है?’’ पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, हम वेजीटेरियन हैं तो वेजिटेबल की ही बात करेंगे. जब थाली का बैंगन लुढ़कने लगे और करेला मुंह चिढ़ाए तो हम क्या करें! हम बुद्धिमान होने के बाद भी गंवार की फल्ली खाते हैं लेकिन वह भी महंगी हो गई. दद्दू को खिलाने के लिए कद्दू खरीदो तो वह भी 40 रुपए किलो है.’’

    हमने कहा, ‘‘आपको आलू की याद क्यों नहीं आ रही? आलू समन्वयवादी होता है. वह किसी भी सब्जी के साथ तालमेल कर लेता है. आलू-गोभी, आलू-पालक, आलू-टमाटर, आलू-मेथी, आलू-बैंगन, आलू-प्याज का बढ़िया एडजस्टमेंट होता है. एक समय कहा गया था- जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेंगे बिहार में लालू. आलू में दम रहता है इसीलिए तो आलूदम बनाया जाता है. मसाले के आलू और जीरे वाले आलू भी आपने खाए होंगे.’’ पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, आलू की भी अलग-अलग किस्म होती है जैसे छोटा आलू, बड़ा आलू, पहाड़ी आलू, मद्रास आलू, छिंदवाड़ा आलू. भजिए और पकौड़े के लिए आलू-प्याज जरूरी है. 

    बच्चों को आलू चिप्स पसंद आती है. आलू के सेव उपवास में खाए जाते हैं. लोग चाट के ठेले पर खड़े होकर आलू टिकिया खाते हैं.’’ हमने कहा, ‘‘जब से हायब्रिड बीजों वाली सब्जियां आई हैं, उनमें पहले जैसा स्वाद नहीं आता. टेबल टमाटर ऐसी चीज है कि काटो तो रस नहीं! वैसे खुशी की बात है कि शिमला मिर्च खरीदने शिमला नहीं जाना पड़ता. बड़ा से बड़ा हिंदी प्रेमी भी मशरूम को मशरूम कहकर ही खरीदता है, उसे कुकुरमुत्ता नहीं कहता!’’