Tarun Gogoi Death

गुवाहाटी. “मैं कांग्रेस का आदमी हूं और अपने जीवन की अंतिम सांस तक कांग्रेस का आदमी ही रहूंगा।” असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने एक बार यह बात कही थी और वह जीवन के अंतिम समय तक अपने इन शब्दों पर कायम रहे। नेहरू-गांधी परिवार के वफादार रहे गोगोई का सोमवार को कोविड-19 के बाद की दिक्कतों के चलते निधन हो गया। वह 86 के थे।

राजनीति के क्षेत्र में वह किसी विराट व्यक्तित्व की तरह स्थापित रहे और अपनी तीक्ष्ण बुद्धि तथा स्पष्टवादी व्यवहार से आगे रहकर असम का नेतृत्व किया। वर्ष 2001 में पहली बार असम की बागडोर संभालने पर उन्होंने कहा था कि उन्हें विश्वास है कि वह पांच साल तक पदस्थ रहेंगे, लेकिन उन्होंने कभी यह कल्पना नहीं की थी कि उनकी लोकप्रियता इतनी हो जाएगी कि वह लगातार तीन बार मुख्यमंत्री के पद पर रहेंगे।

तीन बार के कार्यकाल में गोगोई ने असम को कई उपलब्धियां दिलाईं। वह खूंखार उल्फा सहित विभिन्न उग्रवादी संगठनों को बातचीत की मेज पर लेकर आए और संकटग्रस्त राज्य को फिर से विकास की पटरी पर भी लेकर आए। गोगोई को अपने तीसरे कार्यकाल में पार्टी के भीतर असंतोष का सामना करना पड़ा जिसका नतीजा अंतत: 2016 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के सत्ता से अपदस्थ होने के रूप में निकला।

असंतोष का नेतृत्व कांग्रेस के दिग्गज नेता हिमंत बिस्व सरमा ने किया जिनकी मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा थी, लेकिन गोगोई मंत्रालय में फेरबदल कर लगातार पद पर बने रहे। इसके बाद, सरमा ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया और अपने करीबी नौ विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए। इससे गोगोई और कांग्रेस दोनों का तगड़ा झटका लगा। छह बार सांसद रहे अविचलित गोगोई विपक्ष के नेता के रूप में खड़े रहे। उन्होंने संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ तथा राष्ट्रीय नागरिक पंजी से संबंधित मुद्दों पर आवाज उठाई। कोविड-19 से पीड़ित पाए जाने से कुछ दिन पहले गोगोई अगले विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ महागठबंधन बनाने के लिए विपक्षी दलों के साथ सक्रियता से चर्चाएं कर रहे थे।

कोरोना वायरस से संक्रमित पाए जाने के बाद अस्पताल के लिए एंबुलेंस में सवार होने से पहले उनके चेहरे पर करिश्माई मुस्कान और सकारात्मक रुख साफ नजर आया था। उन्होंने हाल ही में अस्पताल से एक ऑडियो भी जारी किया था जिसमें उन्होंने जीवन की अंतिम सांस तक असम के सभी तबकों की सेवा करने का संकल्प व्यक्त किया था। गोगोई दो बार केंद्रीय मंत्री भी रहे। उनके व्यक्तित्व में दुर्लभ राजनीतिक कुशाग्रता नजर आती थी।

एनडीएफबी (एस) से संबंधित और बोडो-मुस्लिम संघर्ष संबंधी हिंसा की छिटपुट घटनाओं को छोड़कर गोगोई के तीसरे कार्यकाल में अपेक्षाकृत शांति रही। गोगोई ने असम की बागडोर पहली बार 17 मई 2001 को असम गण परिषद से संभाली थी। उनपर उग्रवादी गतिविधियों से प्रभावित और कर्ज के बोझ के चलते वित्तीय रूप से अस्थिर असम को वापस पटरी पर लाने की जिम्मेदारी थी। उस समय राज्य की हालत ऐसी थी कि सरकारी कर्मचारियों को समय पर वेतन तक नहीं मिल पा रहा था।

उन्होंने 2016 में प्रकाशित अपने संस्मरण ‘टर्नअराउंड: लीडिंग असम फ्रॉम द फ्रंट’ में लिखा कि वह जानते थे कि “शपथ लेने, और रजिस्टर में हस्ताक्षर करने में, मुख्यमंत्री के रूप में मेरी पहली जिम्मेदारी, मैं दायित्व के संकल्प पर हस्ताक्षर करूंगा। अपना दायित्व निभाते समय मैं असम के भविष्य का आकार तय करूंगा।”

मुख्यमंत्री के रूप में दूसरे कार्यकाल में गोगोई ने कई उतार-चढ़ाव देखे। करोड़ों रुपये के नॉर्थ कछार हिल्स कोष योजना घोटाले से उनकी सरकार के लिए शर्मिंदगी की स्थिति पैदा हो गई, लेकिन वह उल्फा, एनडीएफबी (वार्ता समर्थक समूह), डीएचडी, यूपीडीएस और अन्य उग्रवादी संगठनों को बातचीत की मेज पर लाकर सरकार की छवि वापस बनाने में सफल रहे। दूसरे कार्यकाल के अंतिम वर्ष में गोगोई के सामने स्वास्थ्य संबंधी दिक्कत पैदा हो गई और उन्हें हृदय की तीन जटिल सर्जरी करानी पड़ीं।

स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें उन्हें कभी दायित्व निभाने से नहीं रोक पाईं। गोगोई ने 2016 के विधानसभा चुनाव में आराम की परवाह किए बिना अधिकतम रैलियां और बैठकें कीं, जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कई मौकों पर उनकी तरफ इशारा करते हुए कहा था कि वह(गोगोई) काफी वृद्ध हैं और उन्हें हट जाना चाहिए।

राजनीतिक यात्रा में सफलता-असफलता दोनों का स्वाद चखने वाले गोगोई ने कहा था, “जब असम का इतिहास लिखा जाएगा तो मेरे तीन कार्यकालों में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों चीजें नजर आएंगी। प्रशंसा और आलोचना दोनों होंगी। लेकिन इन वर्षों की समीक्षा करने की जिम्मेदारी मैं इतिहास को दूंगा।”

गोगोई उस समय संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दोनों के विश्वासपात्र थे। उनका जन्म ऊपरी असम के जोरहाट जिले में एक अप्रैल 1936 को डॉक्टर कमलेश्वर गोगोई और उनकी पत्नी उषा गोगोई के घर में हुआ था। गोगोई के पिता चाहते थे कि उनका बेटा डॉक्टर या इंजीनियर बने, लेकिन गोगोई का दिल राजनीति के लिए धड़कता था। एक बार उन्होंने अपने एक शिक्षक से यह तक कह दिया था कि बड़े होकर वह प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं।

उन्होंने एक बार कहा था, “यह सच है कि मेरे दिल-दिमाग में कांग्रेस की विचारधारा अंतर्निहित है, लेकिन मेरा मूल उद्देश्य असम और देश के लोगों की सेवा करने का रहा है। हां मैंने प्राथमिक उद्देश्य को पूरा करने के लिए राजनीति को माध्यम के रूप में चुना है।” वह देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से बेहद प्रभावित हुए जब वह 1952 में जोरहाट के दौरे पर पहुंचे थे। उस समय वह कक्षा दस के छात्र थे। उन्होंने विभिन्न राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर दिया जिससे उनके शिक्षक और माता-पिता नाराज थे। गोगोई हाईस्कूल में फेल हो गए और अगले साल निजी परीक्षार्थी के रूप में अच्छे नंबर लेकर आए।

स्कूल में पढ़ाई के बाद वह जगन्नाथ बारूह कॉलेज पहुंचे और छात्र राजनीति में सक्रिय हो गए। स्नातक के बाद वह कानून की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय पहुंचे। वह बीमार पड़ गए और वापस असम लौट आए। उन्होंने फिर गौहाटी विश्वविद्यालय से पढ़ाई की। भारत युवक समाज की असम इकाई के सक्रिय नेता गोगोई 1963 में कांग्रेस में शामिल हो गए और तब से आखिर तक वह पार्टी के वफादार रहे।

इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और फिर सोनिया गांधी सहित गांधी परिवार का उन्होंने हमेशा समर्थन किया। वह पार्टी के महासचिव और संयुक्त सचिव भी रहे। उन्होंने चुनावी राजनीति की शुरुआत 1968 में नगर निकाय चुनाव से की। बाद में 1971 में वह पहली बार लोकसभा के लिए जोरहाट सीट से निर्वाचित हुए। गोगोई ने 1972 में जंतु विज्ञान में स्नातकोत्तर डॉली से शादी की। उनके दो बच्चे-बेटी चंद्रिमा और पुत्र गौरव हैं। चंद्रिमा अपने परिवार के साथ विदेश में रहती हैं, जबकि गौरव वर्तमान में लोकसभा में कांग्रेस के उपनेता हैं। (एजेंसी)