Fast food restaurants do not affect children's weight
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    – सीमा कुमारी

    एक सफल व्यक्तित्व के निर्माण में शिक्षा के साथ-साथ अच्छे संस्कारों का होना बहुत जरूरी है। ऐसा आचार्य चाणक्य कहते हैं। उनका मानना है कि बिना संस्कारों के शिक्षा का कोई महत्व नहीं है। बच्चों को अच्छे संस्कार देने में माता-पिता की भूमिका सबसे अहम होती है। इसलिए बच्चों से किसी भी तरह का व्यवहार करते हुए माता- पिता को खास ध्यान रखने की जरूरत होती है।  

    गलत आचरण बच्चों के मन और मस्तिष्क पर बुरा असर डालता है। चाणक्य के मुताबिक, संतान को यदि श्रेष्ठ और सफल बनाना है तो अभिभावकों को आरंभ से ही ध्यान देना चाहिए। बच्चों का मन बहुत कोमल और जिज्ञासु होता है। बच्चे अपने आसपास की चीजों को बहुत ही सूक्ष्मता से देखते हैं और उनसे सीखने का प्रयास करते हैं। इसलिए बच्चों को गुणवान और संस्कारवान बनाना है, तो माता-पिता को बच्चों के सामने कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

    आइए जानें आचार्य चाणक्य की महत्वपूर्ण बातें-

    • ‘चाणक्य-नीति’ में बताया गया है कि माता-पिता को किस आयु में बच्चों के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए। कहते हैं कि 5 वर्ष की आयु तक बच्चों को खूब लाड़-प्यार करना चाहिए, क्योंकि इस आयु में बच्चे अबोध होते हैं। उन्हें सही और गलत का ज्ञान नहीं होता है। इस आयु में की गई गलती जानबूझकर नहीं होती है।
    • ऐसा मानते हैं कि जब बच्चों की आयु 5 वर्ष की हो जाए, तो उसे गलती करने पर डांटा जा सकता है। क्योंकि, इस समय से वह चीजों को समझना शुरू कर देता है। इसलिए बच्चे को आवश्यकता पड़ने पर दुलार करने के साथ डांटना भी बहुत जरूरी होता है।
    • कहते हैं कि जब बच्चा 10 वर्ष से ऊपर हो, तो उसके साथ थोड़ी सख्ती की जा सकती है। क्योंकि, इस आयु में बच्चे हठ यानी जिद्द करने लगते हैं। यदि बच्चा कोई गलत व्यवहार और हठ करता है, तो उसके साथ थोड़ा सख्त व्यवहार किया जा सकता है। लेकिन, माता-पिता को बच्चों से व्यवहार करते समय भाषा को बहुत ही मर्यादित रखना चाहिए और संयम बरतना चाहिए।
    • ‘चाणक्य-नीति’ कहती है कि जब बच्चा 16 वर्ष का हो जाए, तो उसे पीटने या डांटने की बजाय, उससे एक दोस्त की तरह व्यवहार करना चाहिए। क्योंकि, इस आयु में बच्चे में बहुत से बदलाव होने लगते हैं। यह उम्र बहुत ही नाजुक होती है। इस आयु में बच्चे को एक दोस्त की तरह समझा कर उसकी गलती का अहसास कराना चाहिए।
    • चाणक्य के अनुसार, बच्चों को सदैव विद्वान और महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेने के लिए प्रेरित करना चाहिए। उनके जैसा बनने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
    • आचार्य चाणक्य के अनुसार, बच्चों को सत्य के महत्व के बारे में बताना चाहिए। बच्चों में सत्य बोलने की आदत डालनी चाहिए। बच्चे जब झूठ बोलने लगते हैं, तो माता-पिता को तकलीफ होती है। इसलिए आरंभ से ही बच्चों को सत्य बोलने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
    • आचार्य चाणक्य की महत्वपूर्ण बातों को जानने के बाद हर पेरेंट्स की जिम्मेदारी होनी चाहिए, कि वो अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा के साथ अच्छे संस्कार भी जरूर दें, जो आज बदलते समय में विलुप्त होते नजर आ रहे हैं।