मां दंतेश्वरीः शक्तिपीठ जहां गिरा था मां सती का दाँत

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में मां दंतेश्वरी का मंदिर स्थित हैं। मान्यता अनुसार यहां माता सती का दांत गिरने के कारण इस शक्तिपीठ को दंतेश्वरी नाम से पुकारा जाने लगा। 52 शक्तिपीठों मे से एक माने जाने

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में मां दंतेश्वरी का मंदिर स्थित हैं। मान्यता अनुसार यहां माता सती का दांत गिरने के कारण इस शक्तिपीठ को दंतेश्वरी नाम से पुकारा जाने लगा। 52 शक्तिपीठों मे से एक माने जाने वाला यह मंदिर साल भर भक्तों के लिए खुला रहता है। नवरात्रियों में (शरद नवरात्रि तथा चैत्र नवरात्रि) तथा फागुन मेला (मार्च-अप्राईल) का आयोजन किया जाता है। माता के दर्शन के लिए यहां भक्तों का जमावड़ा लगा रहता है। भक्त दूर-दूर से दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर में देवी की काले पत्थर से बनी मूर्ति स्थापित है तथा मंदिर का निर्माण बहुत ही भव्य तरीके से किया गया है। साथ ही मंदिर में भगवान नरसिंह एवं नटराज की मूर्ति भी स्थापित की गई है। शंखिनी और डंकिनी नामक नदियां मंदिर के पास से बहती है। माता के दर्शन मात्र से भक्तों की सारी मुरादे पूरी हो जाती है।

दंतेश्वरी मंदिर में गर्भगृह से पहले अन्य मुर्तियों के साथ ही दुर्गा माता की प्रतिमा और गजलक्ष्मी माता की प्रतिमा स्थापित की गई है। यह प्रतिमा सिक्के की पहलू की तरह आगे-पीछे बनाई गई है। दिवाली में इसकी पूजा विशेष रूप से की जाती है। आपको जानकर हैरानी होगी की माता को जड़ी-बूटियां से तैयार काढ़ा चढ़ाया जाता है। सर्वऔषधि से लक्ष्मी पूजन की सुबह ब्रम्ह मुहूर्त में देवी को स्नान कराया जाता है। साथ ही यह काढ़ा भक्तों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है।

कथा

सतयुग में जब राजा दक्ष ने यज्ञ कराया था, जिसमें शिव जी को आमंत्रित नहीं किया गया था। दक्ष की पुत्री माता सती पति शिव का अपमान नहीं सह पाई और हवन कुंड में कूद गई। भगवान शिव को जब यह जानकार मिली तो सती का शव उठाएं पूरे ब्रह्मांड में तांडव करने लगे। तब भगवान विष्णु ने चक्र ने सति के शव को खण्डित कर दिया। जहा भी माता सती के अवशेष गिरे वहां शक्ति पीठों की स्थापना की गई। उनमें से दंतेवाड़ा एक है जाता है कि यहां सती के दांत गिरे थे।

600 साल पुराना है माई का त्रिशूल

दंतेश्वरी माई का त्रिशूल इस स्तम्भ पर स्थापित किया गया है। मान्यता है कि यह लकड़ी के स्तम्भ 250 वर्ष पुराना है। वहीं माई का त्रिशूल 600 साल पुराना है। 

आंध्र प्रदेश के वारंगल से आए थे त्रिशूल 

एक प्रधांन पुजारी के अनुसार बसंत पंचमी से सारे कार्यक्रमों की शुरूवात हो जाती है। देवी भगवती का प्रतीक यह त्रिशूल तांबे से निर्मित है। वहीं माना ताजा है कि राजा पुरषोत्तम देव ने यह त्रिशूल आंध्र प्रदेश के वारंगल से लाए थे।

मेला समाप्त होने पर वापस किया जाता है त्रिशूल 

एक पुजारी ने बताया कि हर साल बसंत पंचमी पर दंतेश्वरी मंदिर में वैदिक मंत्रोचारण के साथ त्रिशूल स्तंभ स्थापित किया जाता है। आमंत्रित देवी-देवताओं की विदाई और मेला समाप्त होने के बाद  त्रिशूल को वापस मंदिर में रखा जाता है।