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    -सीमा कुमारी 

    हिन्दू मान्यता अनुसार हर महीने त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। इस साल का दूसरा प्रदोष व्रत 26 मार्च, शुक्रवार को है। शास्त्रों के अनुसार, प्रदोष व्रत में भगवान शिव की पूजा की जाती है। प्रदोष व्रत करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों पर अपनी कृपा बनाएं रखते हैं। प्रदोष व्रत का नाम उसके दिन के अनुसार होता है। इस बार त्रयोदशी तिथि शुक्रवार को पड़ने के कारण यह शुक्रप्रदोष कहलाएगा। 

    हिन्दू धर्म में इस व्रत का बहुत महत्व है। वहीं नियम और निष्ठा के साथ प्रदोष व्रत करने से भगवान भोलेनाथ की कृपा सदैव बनी रहती है। ऐसा कहा जाता है कि इस व्रत को करने से जीवन के कष्टों से छुटकारा मिलता है। प्रदोष व्रत में भगवान शिव के साथ-साथ शिव परिवार की पूजा करने से भी विशेष पुण्य मिलता है, इस व्रत में माता पार्वती और भगवान गणेश जी की भी पूजा की जाती है। चलिए जानें कब है प्रदोष व्रत, शुभ मुहूर्त, नियम, पूजा विधि और महत्व…

    शुभ मुहूर्त-

    • फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष त्रयोदशी तिथि आरंभ – 26 मार्च 2021 सुबह 08 बजकर 21 मिनट से 
    • फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष त्रयोदशी तिथि समाप्त – 27 मार्च 2021 सुबह 06 बजकर 11 मिनट पर

    पूजा विधि-

    • इस व्रत में भगवान शिव की पूजा के लिए इन  चीजों का होना अनिवार्य है,प्रदोष व्रत में पूजा की थाली में पांच प्रकार के फल, घी, दही, शहद, शक्कर, गाय का दूध, गुड़, गन्ना, गन्ने का रस, अबीर, गुलाल, चंदन, अक्षत, धतूरा, बेलपत्र, शमी के पत्ते, जनेऊ, कलावा, दीपक, कपूर, धूपबत्ती आदि सामाग्री होनी चाहिए।
    • इस व्रत के लिए त्रयोदशी तिथि को प्रातः जल्दी उठकर स्नानादि करके स्वच्छ वस्त्र धारण करके व्रत का संकल्प करें। इसके बाद भगवान शिव का पूजन करें। 
    • पूरे दिन निराहार व्रत करें। इसके पश्चात संध्या के समय प्रदोष काल में पूजन भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश का पूजन करें।
    • भगवान शिव की अभिषेक करके उनकी प्रिय चीजें अर्पित करें।
    • भगवान शिव की पूजा सूर्यास्त से पौन घंटे  यानी, 45 मिनट पहले आरंभ कर देनी चाहिए। 
    • पूजा करने के पश्चात कुशा के आसन पर बैठककर भगवान शिव के मंत्रों का जाप करें।शिव जी का मंत्र- ‘ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः’  

    नियम-

    • इस व्रत में अन्न और नमक का सेवन नहीं किया जाता है।
    • इस व्रत में पूरे दिन निर्जला रहकर संध्या पूजन के बाद केवल एक बार फलाहार ग्रहण किया जाता है।
    • प्रदोष व्रत के दिन व्रती को ब्रह्मचार्य का पालन करना चाहिए। 
    • किसी को अपशब्द नहीं कहने चाहिए। 

    महत्व-  
    प्रदोष व्रत करने से व्यक्ति के जीवन से सभी दुख दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। संतान प्राप्ति के लिए भी यह व्रत बहुत शुभ माना जाता है। माना जाता है कि शुक्रवार के दिन पड़ने वाला प्रदोष व्रत सौभाग्य और संपन्नता प्रदान करता है। इस व्रत को करने से भगवान शिव की असीम कृपा बनी रहती है।