इस तरह करें मां के शक्तिपीठ के दर्शन

हिंदू मान्यता के अनुसार, देवी भागवत पुराण में 108, कालिकापुराण में 26, शिवचरित्र में 51, दुर्गा शप्तसती और तंत्रचूड़ामणि में शक्ति पीठों की संख्या 52 बताई गई है। वहीं ऐसा भी माना जाता है कि जब सती अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ में अपने पति का अपमान सहन नहीं कर पाई तो उसी यज्ञ में कूदकर भस्म हो गई। तब शिवजी अपनी पत्नी सती का जला हुआ अंग लेकर विलाप करते हुए सभी ओर घूमते रहे। जहां-जहां माता के अंग गिरे वहां-वहां शक्तिपीठ निर्मित हो गए। 

भैरवपर्वत अवंती शक्तिपीठ:

मध्यप्रदेश के उज्जैन नगर में शिप्रा नदी के तट के पास भैरव पर्वत पर माता के ऊर्ध्व ओष्ठ (ऊपरी होठ) गिरे थे। इसकी शक्ति है अवंती और भैरव को लम्बकर्ण कहते हैं। हालांकि इसकी स्थिति को लेकर भी मतभेद हैं। कुच विद्वानों के अनुसार इसी स्थिति गुजरात के गिरनार पर्वत के निकट भैरव पर्वत पर है। अत: दोनों स्थानों पर शक्तिपीठ की मान्यता है। चूंकि शक्ति अवंती होने के कारण उज्जैन को सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है।

सती के “ऊर्ध्व ओष्ठ” (ऊपरी होठ) का निपात स्थल भैरव पर्वत है, किंतु इसकी स्थिति को लेकर विद्वानों में मतभेद है। कुछ उज्जैन के निकट शिप्रा नदी तट स्थित भैरवपर्वत को, तो कुछ गुजरात के गिरनार पर्वत के सन्निकट भैरवपर्वत को वास्तविक शक्तिपीठ मानते हैं। अत: दोनों स्थानों पर शक्तिपीठ की मान्यता है। यहाँ की शक्ति ‘अवंती’ तथा भैरव ‘लंबकर्ण’ हैं। शक्ति के अवंती होने से उज्जैन में शक्तिपीठ मानना ज़्यादा उचित प्रतीत होता है। उज्जैन भोपाल (मध्य प्रदेश राजधानी) से 185 कि.मी. तथा इंदौर से 80 किलोमीटर नई दिल्ली-पुणे रेलमार्ग पर स्थित है। उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर भी दर्शनीय है।

जनस्थान शक्तिपीठ:

यह प्रसिद्ध शक्तिपीठ महाराष्ट्र में मध्य रेलवे के मुम्बई-दिल्ली मुख्य रेल मार्ग पर, नासिक रोड स्टेशन से लगभग 8 कि.मी. दूर पंचवटी नामक स्थान पर स्थित भद्रकाली मंदिर ही शक्तिपीठ है, जहाँ सती का ‘चिबुक’ भाग गिरा था। यहाँ की शक्ति ‘भ्रामरी’ तथा शिव ‘विकृताक्ष’ हैं- ‘चिबुके भ्रामरी देवी विकृताक्ष जनस्थले।'[1] अत: यहाँ चिबुक ही शक्तिरूप में प्रकट हुआ। इस मंदिर में शिखर नहीं है, सिंहासन पर नव-दुर्गाओं की मूर्तियाँ है, जिनके बीच में भद्रकाली की ऊँची मूर्ति है।

इस स्थान के ‘नासिक’ नामकरण के पीछे यहाँ की नौ छोटी-छोटी पहाड़ियाँ हैं, जिनके कारण इसका नाम पड़ा-‘नव शिव’, जो शनै:शनै: बदल कर ‘नासिक’ हो गया। इन सभी नौ पहाड़ियों पर माँ दुर्गा का स्थान है, जिनमें एक स्थान पर भद्रकाली की पूर्व परंपरानुगत स्वयंभू मूर्ति है।

इस्लाम शासन में मूर्ति अपमानित न हो, इसलिए गाँव के बाहर उक्त पहाड़ी पर मूर्ति स्थापित की गयी तथा सन् 1790 में सरदार गणपत राव पटवर्धन दीक्षित ने यह वर्तमान मंदिर बनवाया। इसे ‘देवी का मठ’ कहा गया तथा मंदिर के ऊपर दो मंजिलें बनायीं गयीं। यवनों के उत्पात की आशंका से मंदिर पर कलश स्थापित नहीं किया गया। इसी से इस पर शिखर नहीं है। पंच धातु निर्मित माँ भद्रकाली की अत्यंत आकर्षक प्रतिमा लगभग 38 सेंटीमीटर (15 इंच) ऊँची है और इनकी 18 भुजाओं में विविध आयुध हैं।

उल्लेखनीय है कि यहाँ मंदिर की ओर से ही ‘प्राच्यविद्यापीठ’ की स्थापना की गयी है, जहाँ पुरातन गुरु परंपराधारित वेद-वेदांग का अध्ययन होता है। छात्र मंदिर के आस-पास स्थित ब्राह्मणों के 350 घरों से ‘मधुकरी'[2] लाते हैं। उसी का नैवेद्य माँ को अर्पित किया जाता है तथा माँ के त्रिकाल-पूजन की व्यवस्था भी छात्र ही करते हैं। निकटस्थ प्रवासी ब्राह्मण परिवारों के घर से क्रमानुसार पूजार्चन, नैवेद्य, देवी पाठ, नंदादीप आदि के लिए सामग्री-संग्रहण किया जाता है। नवरात्र का उत्सव शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से पूर्णिमा तक धूमधाम से मनाया जाता है।

सर्वशैल शक्तिपीठ:

गोदावरी तीर शक्ति पीठ या सर्वशैल प्रसिद्ध शक्ति पीठ है, यह हिन्दूओं के लिए प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। यह मंदिर भारत के आंध्र प्रदेश, राजमुंदरी के पास गोदावरी नदी के किनारे कोटिलेश्वर मंदिर में स्थित है। गोदावरी ती शक्ति पीठ को सर्वशैल भी कहा जाता है।

गोदावरी तीर शक्ति पीठ एक प्राचीन मंदिरों में से एक है तथा मंदिर की वास्तुकल शानदार व अदभुत है। मंदिर बहुत विशाल दिखता है क्योंकि मंदिर का गोपुरम एक उंचाई पर बना हुआ है। मंदिर में सभी देवी-देवाताओं की मूर्ति स्थिपित है। यह मंदिर गोदावरी नदी के तट पर स्थित है जो भारत में गंगा के बाद दूसरी सबसे लंबी नदी है।

यह मंदिर माता के 51 शक्तिपीठों में से एक है। इस मंदिर में शक्ति को देवी विश्वेश्वरी और राकिनी के रूप पूजा जाता है और भैरव को वत्सनाभ और दण्डपाणि के रूप में पूजा जाता है। पुराणों के अनुसार जहाँ-जहाँ सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ अस्तित्व में आये। ये अत्यंत पावन तीर्थस्थान कहलाते हैं। ये तीर्थ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैले हुए हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी सती ने उनके पिता दक्षेस्वर द्वारा किये यज्ञ कुण्ड में अपने प्राण त्याग दिये थे, तब भगवान शंकर देवी सती के मृत शरीर को लेकर पूरे ब्रह्माण चक्कर लगा रहे थे इसी दौरान भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 51 भागों में विभाजित कर दिया था, जिसमें से सती की बायां गाल इस स्थान पर गिरा था।

हर बारह साल में ‘पुष्करम मेला’ गोदावरी नदी के तट पर आयोजित किया जाता है। भारत के सभी राज्यों से लाखों लोग गोदावरी नदी में स्नान करने के लिए आते हैं ताकि अपने पापों से मुक्ति पा सके।

गोदावरी तीर शक्ति पीठ में सभी त्योहार मनाये जाते है विशेष कर शिवरात्रि, दुर्गा पूजा और नवरात्र के त्यौहार पर विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। त्योहार के दिनों में मंदिर को फूलो व लाईट से सजाया जाता है। मंदिर का आध्यात्मिक वातावरण श्रद्धालुओं के दिल और दिमाग को शांति प्रदान करता है।

रत्नावली शक्तिपीठ:

जब महादेव शिवजी की पत्नी सती अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ में अपने पति का अपमान सहन नहीं कर पाई तो उसी यज्ञ में कूदकर भस्म हो गई। शिवजी जो जब यह पता चला तो उन्होंने अपने गण वीरभद्र को भेजकर यज्ञ स्थल को उजाड़ दिया और राजा दक्ष का सिर काट दिया। बाद में शिवजी अपनी पत्नी सती की जली हुई लाश लेकर विलाप करते हुए सभी ओर घूमते रहे। जहां-जहां माता के अंग और आभूषण गिरे वहां-वहां शक्तिपीठ निर्मित हो गए। हालांकि पौराणिक आख्यायिका के अनुसार देवी देह के अंगों से इनकी उत्पत्ति हुई, जो भगवान विष्णु के चक्र से विच्छिन्न होकर 108 स्थलों पर गिरे थे, जिनमें में 51 का खास महत्व है।

रत्नावली शक्तिपीठ का निश्चित्त स्थान अज्ञात है फिर भी बताया जाता है कि बंगाल के हुगली जिले के खानाकुल-कृष्णानगर मार्ग पर रत्नावली स्थित रत्नाकर नदी के तट पर माता का दायां स्कंध गिरा था। इसकी शक्ति है कुमारी और भैरव को शिव कहते हैं। बंगाल पंजिका के अनुसार यह तमिलनाडु के मद्रास (वर्तमान चेन्नई) में कहीं पर स्थित है। हालांकि बहुत से लोग इसकी स्थिति बंगाल में ही मानते हैं।

मिथिला शक्तिपीठ:

मिथिला शक्तिपीठ के निश्चित स्थान को लेकर अनेक मत-मतान्तर हैं। बिहार के मिथिला में अनेक देवी मंदिरों को शक्तिपीठ माना जाता है। यहाँ सती के वाम स्कंध का निपात हुआ था। मतांतर से तीन विभिन्न स्थानों को शक्तिपीठ माना जाता है, जहाँ वाम स्कंध निपात की मान्यता है-

एक है जनकपुर (नेपाल) से 15 किलोमीटर पूर्व की ओर मधुबनी के उत्तर पश्चिम में ‘उच्चैठ’ नामक स्थान का ‘वनदुर्गा मंदिर’। दूसरा सहरसा स्टेशन के पास स्थित ‘उग्रतारा मंदिर’।

तीसरा समस्तीपुर से पूर्व (61 किलोमीटर दूर) सलौना रेलवे स्टेशन से नौ किलोमीटर आगे ‘जयमंगला देवी मंदिर’। इस शक्तिपीठ की शक्ति ‘उमा’ या ‘महादेवी’ तथा ‘भैरव ‘महोदर’ हैं।

यशोरेश्वरी शक्तिपीठ:

माना जाता है कि इस मंदिर को एक ब्राह्मण ने बनवाया था, जिसका नाम अनारी था. उसमें यशोरेश्वरी शक्तिपीठ के लिए जो मंदिर बनवाया उसके सौ दरवाजे थे. लेकिन ये किस समय बनवाया गया, उसके बारे में किसी को ज्ञात नहीं है. फिर लक्ष्मण सेन और प्रताप आदित्य ने अपने काल में इसका जीर्णोद्धार कराया. अभी यहाँ शनिवार और मंगलवार की दोपहर में पूजा होती है. लेकिन 1971 से पहले यहाँ प्रतिदिन पूजा होती थी. प्रत्येक वर्ष यहाँ काली पूजा के दिन उत्सव का आयोजन होता है. 

इस अवसर पर यहाँ मेले का भी आयोजन होता है. मंदिर के पास में ही पहले एक बड़ा आयताकार एक खूबसूरत मंच था. यह मंच ऊपर से ढका हुआ था. इसे नट मंदिर कहा जाता था. यहाँ पर खड़े होने पर सती माता की मूर्ति देखी जा सकती थी. इसको जीर्णोद्धार तेरहवीं शताब्दी में लक्ष्मण सेन ने करवाया था. लेकिन 1971 के बाद इसे गिरा दिया गया. अब यहाँ निशानी के तौर पर खम्भे ही बचे हैं. यह शक्तिपीठ ईश्वरपुर, श्यामनगर उपनगर, सातखिरा जिला में स्थित है। निकटतम हवाई अड्डा बांग्लादेश की राजधानी ढाका में है.

नंदिनी शक्तिपीठ:

पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के सैंथिया रेलवे स्टेशन नंदीपुर स्थित चारदीवारी में बरगद के वृक्ष के समीप माता का गले का हार गिरा था। इसकी शक्ति है नंदिनी और भैरव को नंदिकेश्वर कहते हैं। माता को वागरी भाषा में नंदोर बोला जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं के हिसाब से नंदनी माता द्वापर युग में यशोदा की बेटी थी, जो कंस से मारी गई थी। इनका उल्लेख दुर्गा सप्तमी में मिलता है।

पश्चिम बंगाल के वीरभूमि या बीरभूम में माता के कई शक्तिपीठ हैं। बीरभूम से विभिन्न स्थानों से शुरू होने वाली कई सीधी बसें हैं। यह शक्ति पीठ स्थानीय रेलवे स्टेशन स केवल10 मिनट की दूरी पर है। निकटतम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा कोलकाता में नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे है।

इन्द्राक्षी शक्तिपीठ:

देवराज इंद्र ने यहाँ पर आदि शक्ति काली की पूजा की थी। दानव-राज रावण (श्रीलंका के शासक या राजा) और भगवान राम ने भी यहाँ देवी शक्ति की पूजा की हैं। यहाँ देवी सती की पायल (आभूषण) गिरी थी तथा यहाँ देवी! इन्द्राक्षी शक्ति और राक्षसेश्वर, भैरव  के रूप में अवस्थित हैं। नैनातिवु नागापोशनि अम्मन मंदिर एक प्राचीन और ऐतिहासिक हिंदू मंदिर है। यह मंदिर मां पार्वती को समर्पित है, जिन्हें नागपोशनी या भुवनेश्वरी के रूप में हैं। 

कहा जाता है कि नवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने इसे शक्तिरूप में पहचाना। ब्रह्माण्ड पुराण में इसका उल्लेख है। मंदिर परिसर में ऊंचे-ऊंचे चार गोपुरम हैं। 1620 में पुर्तगालियों द्वारा प्राचीन संरचना को नष्ट करने के बाद 1720 से 1790 के दौरान वर्तमान संरचना का निर्माण किया गया था। मंदिर में प्रतिदिन लगभग 1000 आगंतुक आते हैं और त्योहारों के दौरान लगभग 5000 आगंतुक आते हैं।

अंबिका शक्तिपीठ:

राजस्थान की राजधानी गुलाबी नगरी जयपुर से उत्तर में महाभारतकालीन विराट नगर के प्राचीन ध्वंसावशेष के निकट एक गुफ़ा है, जिसे भीम की गुफ़ा कहते हैं। यहीं के विराट ग्राम में यह शक्तिपीठ स्थित है। मान्यता है कि इस स्थान पर सती के दायें पाँव की उँगलियाँ गिरी थीं। यहाँ की सती अंबिका तथा शिव अमृत हैं।

जयपुर तथा अलवर दोनों स्थानों से विराट ग्राम तक आवागमन के लिए मार्ग हैं, जहाँ टैक्सी से जाना सुविधाजनक है। भरतपुर को लोहागढ़ के नाम से भी पहचाना जाता है। मंदिर यहाँ के विराटनगर के बैरत गाँव में हैं।

यह मंदिर राजस्थान के भरतपुर के पास विरात में स्तिथ है। यह जगह राजस्थान की गुलाबी नगरी जयपुर से लगभग 90 km की दूरी पर है। जयपुर से आप लोकल ट्रैन या कार बस द्वारा इस शक्तिपीठ की यात्रा कर सकते है।

माँ सती के इस जगह बाये पैर की अंगुलिया गिरी थी और इस शक्तिपीठ की स्थापना हुई। यहाँ पार्वती माँ अम्बिका के रूप में और भगवान् शिव अमृत्सेवर के रूप में पुजे जाते है।